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Archive for August, 2008

आदत से लाचार

Posted by cls On August - 6 - 2008

भुवननगर में एक राजा राज करता था। उसके भवन के शयनकक्ष में एक जूँ रहती थी। वह नियमित रुप से राजा का रक्तपान कर सुखपूर्वक जीवन- यापन करती थी। एक दिन कहीं से एक खटमल राजा के शयनकक्ष में आ गया। खटमल को देखकर जूँ निराश हो गयी। Read the rest of this entry »

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ईर्ष्‍या

Posted by cls On August - 5 - 2008

दो भाईयो की दुकान एक ही बजार मे थी, ओर थी भी बिलकुल आमने सामने,ओर दोनो भाई बेचते भी एक ही तरह का समान थे, दोनो की दुकाने भी भगवान की दया से चलती भी खुब थी,पेसो की कमी भी दोनो को नही थी, लेकिन इस के वावजुद दोनो भाईयो की सेहत दिन पर दिन गिरती जाती थी,बहुत दवा दारु किया,झाड पुछ भी करवाया,पुजा पाठ यानि सब कुछ करवाया लेकिन दोनो भाईयो की सेहत मे कोई भी फ़र्क नही आया, थक हार कर अब दोनो भाई जादु टोनो बालो के पास भी गये लेकिन बात फ़िर भी ना बनी,ओर दोनो भाई यह सोच कर बेठ गये कि कोई लाईलाज बिमारी लग गई हे.समय बीतता रहा, एक दिन एक रिश्तेदार जब उन्हे मिलने आया तो दोनो भाईयो को देख कर हेरान हुया, फ़िर दो चार दिन उन के साथ रहा ओर जाने से पहले बोला मेरे पास एक ईलाज हे आप दोनो की बिमारी का, लेकिन थोडा कठिन हे,दोनो भाई सुन कर खुश हुये ओर बोले बताओ हम सब कुछ करने को तेयार हे, तो उस रिशते दार ने कहा ईलाज शुरु करने से पहले आप दोनो को अपना स्थान बदलना पडेगा,दोनो भाई कुछ समझ नही सके तो, रिशतेदार बोला तुम दोनो भाई एक महीने तक अपनी दुकान मे मत जाना, बल्कि एक महीना दुसरे की दुकान इमान्दारी से समभालाना, उस के बाद तुम्हारा ईलाज करुगा,दुसरे दिन से ही भाई एक दुसरे की दुकान सम्भालने लगे।

एक महीने के बाद जब वह रिश्तेदार इन से मिलने आया तो दोनो भाई काफ़ी स्वस्थ दिख रहे थे,ओर काफ़ी खुश भी थे, तब रिश्तेदार ने कहा की आप दोनो को कोई भी बिमारी नही बस तुम दोनो मे ईर्ष्‍या थी,जब तुम अपनी अपनी दुकान पर बेठे दुसरे की दुकान मे ग्राहक को जाते देखते थे तो जलते थे, ओर यह बात मेने दो दिन तुम्हारे साथ रह कर देखी थी, ओर उसी ईर्ष्‍या से तुम अपना ही नुकसान करते थे, अब तुम दुसरे की दुकान पर बेठ कर अपनी दुकान मे जाते ग्राहक देख कर खुश होते हो, यही तुम्हारे स्वस्थ होने का राज हे।

हमे कभी भी दुसरो से ईर्ष्‍या या जलन नही करनी चाहिये

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भगवान दर्शन

Posted by cls On August - 5 - 2008

Radha Krishna

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आंखों की कसरत

Posted by cls On August - 5 - 2008
हिन्दी वेब.नेट को देख कर थक गये हो तो थोडी, आंखॊ की कसरत कर ले,
क्या कहा, ये घूम रहे हे ?

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सबसे प्यारा मेरे लाल

Posted by cls On August - 4 - 2008
माँ ने कहा बेटे से दिखा कोई कमालबेटे ने पड़ोसी की लड़की को मल दिया गुलाल

सबसे प्यारा मेरे लाल
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नन्हो के चुट्कले

Posted by cls On August - 4 - 2008


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अकेला पन व्यक्ति को उदास व नीरस बना देता हे तथा कुछ करने कि इच्छाओ को खत्म कर देता हे जिससे उस व्यक्ति कि कोइ मन्जिल नही होती और उसका सामाजिक स्वरूप व सामाजिक बंधनों से मोह कम होने लगता है।
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रुद्राक्ष क्या है ?

Posted by cls On August - 4 - 2008

रुद्राक्ष एक फल की गुठली है। इसका उपयोग आध्यात्मिक क्षेत्र में किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शंकर की आँखों के जलबिंदु से हुई है। इसे धारण करने से सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। रुद्राक्ष शिव का वरदान है, जो संसार के भौतिक दु:खों को दूर करने के लिए प्रभु शंकर ने प्रकट किया है।
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वास्तु विज्ञान बच्चों का अध्ययनकक्ष वास्तुसम्मत नियमों के अनुसार बनाने का मुख्य उद्देश्य यह है कि बच्चे तनावरहित व शांत चित्त होकर अध्ययन कर सके और उसकी एकाग्रता में बाधा न पड़े। वास्तु के अनुसार उत्तर या पश्चिम दिशा अध्ययन कक्ष के लिए उत्तम रहती है।

इसका सैद्धांतिक कारण यह है कि उत्तर दिशा का प्रतिनिधि ग्रह बुध है। बुध का संबंध शिक्षा व बुद्धि से माना गया है तथा पश्चिम दिशा का प्रतिनिधि ग्रह शनि है, जिनका संबंध एकाग्रता व गहन अध्ययन से है। कक्ष का प्रवेशद्वार उत्तर अथवा पूर्व की ओर रखा जा सकता है। खिड़की या रोशनदान पूर्व दिशा की ओर रखना चाहिए क्योंकि प्रात:काल यहां से आने वाली सूर्य की किरणों में वातावरण को शुद्ध करने की अद्भुत क्षमता होती है, जिससे नकारात्मक ऊर्जा का शमन होता है।

दक्षिण दिशा में द्वार एवं खिड़कियां नहीं बनानी चाहिए। कक्ष में स्टडी टेबल इस प्रकार रखें कि अध्ययन करते समय बच्चों का मुख पूर्व, उत्तर या ईशान कोण (पूर्व-उत्तर दिशा) की ओर रहे। पुस्तकों की अलमारी वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम दिशा) व नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम दिशा) को छोड़कर अन्यत्र कहीं भी रखी जा सकती है। बच्चों को भी इन दिशाओं की ओर मुख करके अध्ययन नहीं करना चाहिए।

इसका कारण यह है कि वायव्य कोण के स्वामी वायुदेव तथा ग्रह चंद्रमा है, दोनों की प्रकृति चलायमान है। चंद्रमा मन का कारक भी है। अत: इस ओर अध्ययन करने से चित्त में चंचलता आती है और एकाग्रता की कमी रहती है। इसी प्रकार नैऋत्य कोण के स्वामी तथा ग्रह राहु है। यहां अध्ययन करने से बच्चों का पढ़ाई में मन नहीं लगता और वे सिर्फ दिखावे के लिए अध्ययन का ढोंग करते हैं।

ईशान कोण में इष्टदेव, श्रीगणोश तथा मां सरस्वती का चित्र अवश्य लगाएं। गणपति विघ्नहर्ता हैं और मां सरस्वती की उपासना बुद्धि तथा विद्या का विकास करती है। ईशान कोण को सदैव स्वच्छ रखें। कमरे का मध्य स्थान ब्रrा स्थान कहलाता है, इस स्थान पर भी भारी सामान नहीं रखना चाहिए। इस स्थान को खाली रखना उचित है। सोने के लिए बिस्तर दक्षिण-पश्चिम दिशा में रखना चाहिए, सोते समय सिर पूर्व या दक्षिण की ओर हो।

कमरे की दीवारों पर हल्के हरे रंग का पेंट करवाएं क्योंकि हरा रंग बुध का होता है और बुध का संबंध शिक्षा व बुद्धि से है। समय की प्रतीक घड़ी को उत्तर-पूर्व दिशा की तरफ दीवार पर लगाएं। इसके पीछे धारणा यह है कि ग्रहों के राजा सूर्य इसी दिशा में उदय होते हैं अर्थात हर नए दिन की शुरुआत इसी दिशा से होती है। सकारात्मक विचारों की उत्पत्ति व प्रेरणा भी इसी दिशा से प्राप्त होती है।

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वास्तु और दिशायें

Posted by cls On August - 3 - 2008

जहां दोनों दिशाएं मिलती हैं, वह कोण बेहद महत्वपूर्ण होता है , क्योंकि वह दोनों दिशाओं से आने वाली शक्तियों और ऊर्जाओं का मिला देता है।

  • उत्तर और पूर्व के बीच वाले कोण को उत्तर-पूर्व या ईशान कोण कहते हैं।
  • पूर्व और दक्षिण के बीच वाले कोण को दक्षिण-पूर्व या आग्नेय कोण कहते हैं ।
  • दक्षिण और पश्चिम के बीच वाले कोण को दक्षिण-पश्चिम या नैऋत्य कोण कहते हैं।
  • उसी तरह पश्चिम और उत्तर के बीच के कोण को उत्तर-पश्चिम या वायव्य कोण कहा जाता है ।
  • मध्य स्थान को ब्रह्रास्थान के रूप में जाना गया है।



उत्तर

उत्तर दिशा के अधिष्ठित देवता कुबेर हैं जो धन और समृद्धि के द्योतक हैं। ज्योतिष के अनुसार बुद्ध ग्रह उत्तर दिशा के स्वामी हैं। उत्तर दिशा को मातृ स्थान भी कहा गया है। इस दिशा में स्थान खाली रखना या कच्ची भूमि छोड़ना धन और समृद्धि कारक है।

पूर्व

पूर्व दिशा के देवता इंद्र हैं। आत्मा के कारक और रासृष्टि प्रकाश सूर्य पूर्व दिशा से उदय होते हैं। पूर्व दिशा पितृस्थान का द्योतक है। इस दिशा में कोई रूकावट नहीं होनी चाहिए। पूर्व दिशा में खुला स्थान परिवार के मुखिया की लम्बी उम्र का प्रतीक है।

पश्चिम

वरूण पश्चिम दिशा के देवता है और ज्योतिष के अनुसार शनिदेव पश्चिम दिशा के स्वामी हैं। यह दिशा प्रसिद्धि , भाग्य और ख्याति का प्रतीक है।

दक्षिण

यम दक्षिण दिशा के अधिष्ठित देव हैं। दक्षिण दिशा में वास्तु के नियमानुसार निर्माण करने से सुख , सम्पन्नता और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

ईशान कोण

पूर्व और उत्तर दिशाएं जहां पर मिलती हैं उस स्थान को ईशान कोण की संज्ञा दी गई है। यह दो दिशाओं का सर्वोतम मिलन स्थान है। यह स्थान भगवान शिव और जल का स्थान भी माना गया है। ईशान को सदैव स्वच्छ और शुद्ध रखना चाहिए। इस स्थान पर जलीय स्रोतों जैसे कुंआ , बोरिंग वगैरह की व्यवस्था सर्वोतम परिणाम देती है। पूजा स्थान के लिए ईशान कोण को विशेष महत्व दिया जाता है। इस स्थान पर कूड़ा करकट रखना , स्टोर , टॉयलट वगैरह बनाना वर्जित है।

आग्नेय कोण

दक्षिण और पूर्व के मध्य का कोणीय स्थान आग्नेय कोण के नाम से जाना जाता है। नाम से ही साफ हो जाता है कि यह स्थान अग्नि देवता का प्रमुख स्थान है इसलिए रसोई या अग्नि संबंधी (इलैक्ट्रॉनिक उपकरणों आदि) के रखने के लिए विशेष स्थान है। शुक्र ग्रह इस दिशा के स्वामी हैं। आग्नेय का वास्तुसम्मत होना निवासियों के उत्तम स्वास्थ्य के लिए जरूरी है।

नैऋत्य कोण

दक्षिण और पश्चिम दिशा के मध्य के स्थान को नैऋत्य दिशा का नाम दिया गया है। इस दिशा पर निरूति या पूतना का आधिपत्य है। ज्योतिष के अनुसार राहू और केतु इस दिशा के स्वामी हैं। इस क्षेत्र का मुख्य तत्व पृथ्वी है। पृथ्वी तत्व की प्रमुखता के कारण इस स्थान को ऊंचा और भारी रखना चाहिए। इस दिशा में गड्ढे , बोरिंग , कुंए इत्यादि नहीं होने चाहिए।

वायव्य कोण

उत्तर और पश्चिम दिशा के मध्य के कोणीय स्थान को वायव्य दिशा का नाम दिया गया है। इस दिशा का मुख्य तत्व वायु है। इस स्थान का प्रभाव पड़ोसियों , मित्रों और संबंधियों से अच्छे या बुरे संबंधों का कारण बनता है। वास्तु के सही उपयोग से इसे सदोपयोगी बनाया जा सकता है।

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