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Archive for November, 2008

फूड टिप्स

Posted by cls On November - 4 - 2008

डेयरी प्रोडक्ट्स खाएं
कैल्शियम की अधिकता वाले डेयरी फूड्स हड्डियों को मजबूत करते हैं और स्लिम रहने में भी मदद करते हैं। लो- कैलोरी वाले उत्पादों को प्राथमिकता दें जैसे स्किम्ड मिल्क और लो- फैट दही। हड्डियों का घनत्व अच्छा होने पर भविष्य में आप ओस्टिपोरोसिस से बचे रहेंगे। पर्याप्त कैल्शियम और पोटेशियम के मिलने से आपको हाइपरटेंशन का सामना करने में भी मदद मिलती है।

नमक कम खाएं
एक व्यक्ति को दिन में सिर्फ 6 ग्राम नमक की आवश्यकता होती है। इससे ज्यादा नमक खाने से नुकसान होने की सम्भावना होती है। खाने में जो नमक पड़ता है, उससे नमक की भरपाई हो जाती है। इसलिए अलग से नमक खाने से बचें, कम नमक खाने से आपका ब्लड प्रेशर संतुलित रहता है ।

नट्स खाएं
नट्स में कैलोरी अधिक होती है। लेकिन इनमें वह आवश्यक फैट्स होते हैं जिनकी जरूरत स्वस्थ त्वचा और हार्मोन्स के लिए होती है। साथ ही मध्यम दर्जे की फैट डाइट पर आसानी से टिका जा सकता है बजाए लो- फैट डाइट के। शोधों से मालूम हुआ कि नट्स खुराक कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करती है जिससे आखिरकार दिल को फायदा होता है। नट्स में पौष्टिकता होती है, इनसे पेट भरे का एहसास होता है, इसलिए भोजन के बीच स्नैक्स के तौर पर इन्हें लेना अच्छा होता है।
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बिंदिया भारतीय नारी के सौभाग्य एवं सौन्दर्य का प्रतीक है। एक आम नारी मेकअप के नाम पर कुछ करे या न करे पर एक प्यारी सी बिंदिया अवश्य लगाती है, क्योंकि यह किसी कवि या शायर की कल्पना नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति का प्रतीक तथा नारी शृंगार की परिपूर्णता की निशानी है। एक छोटी सी खूबसूरत बिंदिया सितारे जैसी चमक कर नारी के चेहरे व सौन्दर्य को चार-चांद लगा देती है।

प्राचीनकाल में अक्षत, रोली, फूल पत्ती, पेड़ पौधों की छाल, चंदन आदि घिसकर माथे पर बिंदी के रूप में लगाय जाते थे। कुछ स्त्रियां अपने माथे, हाथ एवं गले पर स्थायी रूप से गोदना गोदवाकर बिंदी का प्रतीक बनवा लिया करती थीं क्योंकि बिंदिया सुहाग का प्रतीक जो है। बिंदिया ग्रामीण, शहरी युवा बुजुर्ग व आधुनिकाओं सभी को प्रिय है।

बिंदियां को कई नामों से जाना जाता है, जैसे टिकिया, टिकुली, बिंदी, टिकी, टीका आदि। गोल बिंदी को कुछ लंबा स्वरूप देने पर उसे तिलक का कहते हैं। आजकल वेल्वेट तथा सेल्यूलाइड की बनी बनायी बिंदिया बाजार से मिलती है, उन पर विभिन्न तरह की कलाकृतियां व चित्रकारी तो होती ही है, साथ ही वे अनेक रंगों में भी उपलब्ध होती हैं।
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पानी भी एक औषधि है

Posted by cls On November - 4 - 2008

हमारे शास्त्रों में लिखा है – अजीर्णे भेषजं वारि जीर्णे वारि बलप्रदम्, अर्थात् अजीर्ण में पानी दवा का काम करता है और भोजन पचने के बाद पानी पीने से शरीर बलवान होता है। पानी बहुत से रोगों में दवा का काम करता है। ठंडे और गरम पानी में अलग अलग औषधीय गुण होते है। कई रोगों में ठंडा पानी और कई रोगों में गरम पानी का उपयोग होता है।

  1. आग से जलने या झुलसने पर, जले- झुलसे अंग को ठंडे पानी में डुबोकर रखे। इससे जलन मिटती है, शान्ति मिलती है और घाव और फफोला नहीं होता। बहुतों को भ्रम है कि जले अंग को पानी में डुबोने से घाव बढ जाते है। असल में जले अंग पर पानी से छींटे देने या पानी डालने से घाव बढ जाते है अतः शरीर के जले अंग पर न तो पानी के छींटे दे और न ही पानी डालना चाहिये बल्कि जले अंग को पानी में कम से कम एक घंटे तक डुबोकर रखना चाहिये।
  2. मोच आने या चोट लगने या चोट के साथ खून आने पर पर उस जगह पर ठंडे पानी या बर्फ की पट्टी लगाये। इससे सूजन नहीं होती और दर्द कम हो जाता है। गरम पानी की पट्टी लगाने या सेंक करने से सूजन आकर दर्द बढ जाता है।
  3. गरम पानी से वात रोगों, जोडों के दर्द, घुटने के दर्द, कमर दर्द, गठिया रोग व कंधे की जकडन में लाभ होता है। इसमे गरम पानी से भाप से सेंक दिया जाता है।
  4. इंजेक्शन लगाने के बाद यदि सूजन आकर दर्द हो तो उस स्थान पर ठंडे पानी या बर्फ की पट्टी लगाने से लाभ होता है। वहां गरम पानी से सेंक न करे।
  5. यदि रात में नींद न आती हो तो सोने से पहले दोनों पैरों को घुटनों तक सहने योग्य गरम पानी से भरी बाल्टी या टब मे पन्द्रह मिनट तक डुबोकर रखे और सिर पर ठंडॆ पानी में भिगोकर निचोडा हुआ तौलिया रखे। इसके बाद पैरों को बाहर निकालकर पोंछ ले और सिर से तौलिया हटाकर सो जाय। अच्छी नींद आ जायेगी।
  6. अस्पतालों और नर्सिंग होम में पतले दस्त या उल्टी दस्त के रोगियों को सेलाइन का पानी चढाते है। यह सेलाइन क्या है – नमकीन पानी है। इससे रोगी ठीक हो जाता है।
  7. बच्चों को पतले दस्त या डायरिया होने पर जीवन रक्षक घोल बनाकर देने से बच्चे स्वस्थ हो जाते है। शरीर में पानी की कमी न हो, इसलिये यह घोल दिया जाता है। पानी की कमी से मृत्यु हो जाती है। यही कारण है कि रोगी के शरीर में पानी पहुंचाया जाता है, चाहे मुख से हो चाहे सेलाइन से।

दूध का महत्त्व

Posted by cls On November - 4 - 2008

भारत में गाय के दूध के औषधीय गुणों को अति प्राचीनतम काल से जाना जाता है। चिकित्सा की दृष्टि से दूध बहुत महत्त्वपूर्ण औषधि है तथा शरीर के लिये उच्च श्रेणी का खाद्य पदार्थ है।

भोज्य पदार्थ के रुप में दूध महत्त्वपूर्ण आहार का विलक्षण समुच्चय है। दूध शरीर के लिये आवश्यक प्रोटीन, विटामिन, कार्बोंहाइड्रेट्स, खनिज, वसा, इन्जाइम तथा आयरन इत्यादि सभी तत्त्वों से युक्त होता है। दूध में प्रोटीन और कैल्शियम होने से यह दूधिया होता है। मनुष्य के लिये दूध एक सम्पूर्ण आहार है। इसे पौष्टिक भोजन के रुप में सेवन बालक, प्रौढ, वृद्ध सभी आयु के व्यक्ति सेवन कर सकते है, क्योंकि -

  1. प्रकृति में उपलब्ध पदार्थों में केवल दूध में शुगर लेक्टोज (दुग्ध-शर्करा) होता है।
  2. व्यक्ति के नाडी मण्डल और बुद्धि विकास के लिये दुग्ध-शर्करा बहुत आवश्यक होता है।
  3. ऊर्जस्वी गतिशील शारीरिक क्रिया कलापों के लिये कार्बोहाइड्रेट जरुरी होता है।
  4. शरीर मे लाल रक्त कोशिकाओं के संश्लेषण (समन्वय) और शारीरिक शक्ति के सुधार के लिये आयरन (लौह तत्त्व) आवश्यक होता है।
  5. कैल्शियम और फास्फोरस दांतों और हड्डियों को मजबूत रखते है।
  6. विटामिन ए आँखों की रोशनी और त्वचा को स्वस्थ रखता है और कम्पन रोग को हटाता है।
  7. विटामिन बी नाडी मण्डल और शरीर के विकास के लिये जरूरी है।
  8. विटामिन सी शारीरिक रोगों के प्रति प्रतिरोधक शक्ति पैदा करता है।
  9. विटामिन डी सुखण्डी रोग से सुरक्षा प्रदान करता है।

इनके अलावा दूध के नियमित उपयोग की सिफारिश निम्न कारणों से भी की जाती है-

  1. रात्रि में सोने से पहले एक कप दूध का सेवन रक्त के नव निर्माण में सहायक होता है एवं विषैले पदार्थों को निष्क्रिय करता है।
  2. प्रातःकाल हलके गर्म दूध का सेवन पाचन क्रिया को संयोजित करता है।
  3. गरम दूध में मिस्री और काली मिर्च मिलाकर पीने से सर्दी जुकाम ठीक हो जाता है।
  4. दूध मे सबसे कम कॉलेस्ट्रोल (14 मि.ग्रा./100 ग्राम) होता है अतः मधुमेह के रोगियों को वसा रहित दूध सेवन की सलाह दी जाती है।
  5. उच्च रक्तचाप से पीडित रोगी को प्रतिदिन 200 मि.ली. दध पीने की सलाह दी जाती है।
  6. अग्निअवर्धक व्रण (Peptic Ulcer) के रोगियों के लिये दूध एक आदर्श आहार है। 50 मि.ली. ठंडे दूध में एक चम्मच चने का सत्तू दो दो घंटे पर देने से अल्सर में लाभ होता है।
  7. दूध सेवन से सात्त्विक विचार, मानसिक शुद्धि और बौद्धिक विकास होता है।

श्री मद्गोस्वामी तुलसीदासजी रचित

श्री रामचरितमानस


सुंदरकाण्ड

श्री राम गुणगान की महिमा

निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।
यह चरित कलि मल हर जथामति दास तुलसी गायऊ॥
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥

सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥६०॥

मासपारायण, चौबीसवाँ विश्राम
इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने
पंचमः सोपानः समाप्तः।
कलियुग के समस्त पापों का नाश करने वाले श्री रामचरितमानस
का यह पाँचवाँ सोपान समाप्त हुआ।
(सुंदरकाण्ड समाप्त)

—-पीछे आगे—-


सुन्दर काण्ड
  1. मंगलाचरण
  2. श्री हनुमान्‌जी का लंका को प्रस्थान
  3. लंका वर्णन
  4. हनुमान्‌-विभीषण संवाद
  5. श्री हनुमान्‌जी अशोक वाटिका में
  6. श्री सीता-त्रिजटा संवाद
  7. श्री सीता-हनुमान्‌ संवाद
  8. श्री हनुमान्‌जी द्वारा अशोक वाटिका विध्वंस
  9. श्री हनुमान्‌-रावण संवाद
  10. लंकादहन
  11. श्री हनुमान्‌जी का सीताजी से विदा माँगना
  12. श्री राम-हनुमान्‌ संवाद
  13. श्री रामजी का समुद्र तट पर पहुँचना
  14. मंदोदरी-रावण संवाद
  15. रावण को विभीषण का समझाना
  16. विभीषण का श्री रामजी की शरण के जाना
  17. समुद्र पार करने के लिए विचार
  18. दूत का रावण को समझाना
  19. समुद्र पर श्री रामजी का क्रोध
  20. श्री राम गुणगान की महिमा

श्री रामचरितमानस

  1. बालकाण्ड
  2. अयोध्याकाण्ड
  3. अरण्यकाण्ड
  4. किष्किन्धाकाण्ड
  5. सुंदरकाण्ड
  6. उत्तरकाण्ड
  7. लंकाकाण्ड

श्री मद्गोस्वामी तुलसीदासजी रचित

श्री रामचरितमानस


सुंदरकाण्ड

समुद्र पर श्री रामजी का क्रोध

बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥५७॥

लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानु॥
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीति। सहज कृपन सन सुंदर नीति॥१॥

ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी॥
क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा॥२॥

अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा॥
संधानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥३॥

मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना॥४॥

काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच॥५८॥

सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥।
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥१॥

तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहें सुख लहई॥२॥

प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं॥
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥३॥

प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई॥
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई॥४॥

सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ॥५९॥

नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाईं रिषि आसिष पाई॥
तिन्ह कें परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥१॥

मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई॥
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ॥२॥

एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी॥
सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा॥३॥

देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी॥
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा॥४॥

—-पीछे आगे—-


सुन्दर काण्ड
  1. मंगलाचरण
  2. श्री हनुमान्‌जी का लंका को प्रस्थान
  3. लंका वर्णन
  4. हनुमान्‌-विभीषण संवाद
  5. श्री हनुमान्‌जी अशोक वाटिका में
  6. श्री सीता-त्रिजटा संवाद
  7. श्री सीता-हनुमान्‌ संवाद
  8. श्री हनुमान्‌जी द्वारा अशोक वाटिका विध्वंस
  9. श्री हनुमान्‌-रावण संवाद
  10. लंकादहन
  11. श्री हनुमान्‌जी का सीताजी से विदा माँगना
  12. श्री राम-हनुमान्‌ संवाद
  13. श्री रामजी का समुद्र तट पर पहुँचना
  14. मंदोदरी-रावण संवाद
  15. रावण को विभीषण का समझाना
  16. विभीषण का श्री रामजी की शरण के जाना
  17. समुद्र पार करने के लिए विचार
  18. दूत का रावण को समझाना
  19. समुद्र पर श्री रामजी का क्रोध
  20. श्री राम गुणगान की महिमा

श्री रामचरितमानस

  1. बालकाण्ड
  2. अयोध्याकाण्ड
  3. अरण्यकाण्ड
  4. किष्किन्धाकाण्ड
  5. सुंदरकाण्ड
  6. उत्तरकाण्ड
  7. लंकाकाण्ड

दूत का रावण को समझाना

Posted by cls On November - 1 - 2008

श्री मद्गोस्वामी तुलसीदासजी रचित

श्री रामचरितमानस


सुंदरकाण्ड

दूत का रावण को समझाना

की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर ॥५३॥

नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें॥
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा॥१॥

रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हें दुख नाना॥
श्रवन नासिका काटैं लागे। राम सपथ दीन्हें हम त्यागे॥२॥

पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई॥
नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी॥३॥

जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा॥
अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला॥४॥

द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि॥५४॥

ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना॥
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रैलोकहि गनहीं॥१॥

अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर॥
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं॥२॥

परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा॥
सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहिं न त भरि कुधर बिसाला॥३॥

मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा॥
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहुँ ग्रसन चहत हहिं लंका॥४॥

सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।
रावन काल कोटि कहुँ जीति सकहिं संग्राम॥५५॥

राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई॥
सक सर एक सोषि सत सागर। तव भ्रातहि पूँछेउ नय नागर॥१॥

तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं॥
सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा॥२॥

सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई॥
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई॥३॥

सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें॥
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी॥४॥

रामानुज दीन्हीं यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती॥
बिहसि बाम कर लीन्हीं रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन॥५॥

बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस॥५६क॥

की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।
होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग॥५६ख॥

सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई॥
भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा॥१॥

कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी॥
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा॥२॥

अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ॥
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही॥३॥

जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे॥
जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही॥४॥

नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ॥
करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई॥५॥

रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी॥
बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा॥६॥

—-पीछे आगे—-


सुन्दर काण्ड
  1. मंगलाचरण
  2. श्री हनुमान्‌जी का लंका को प्रस्थान
  3. लंका वर्णन
  4. हनुमान्‌-विभीषण संवाद
  5. श्री हनुमान्‌जी अशोक वाटिका में
  6. श्री सीता-त्रिजटा संवाद
  7. श्री सीता-हनुमान्‌ संवाद
  8. श्री हनुमान्‌जी द्वारा अशोक वाटिका विध्वंस
  9. श्री हनुमान्‌-रावण संवाद
  10. लंकादहन
  11. श्री हनुमान्‌जी का सीताजी से विदा माँगना
  12. श्री राम-हनुमान्‌ संवाद
  13. श्री रामजी का समुद्र तट पर पहुँचना
  14. मंदोदरी-रावण संवाद
  15. रावण को विभीषण का समझाना
  16. विभीषण का श्री रामजी की शरण के जाना
  17. समुद्र पार करने के लिए विचार
  18. दूत का रावण को समझाना
  19. समुद्र पर श्री रामजी का क्रोध
  20. श्री राम गुणगान की महिमा

श्री रामचरितमानस

  1. बालकाण्ड
  2. अयोध्याकाण्ड
  3. अरण्यकाण्ड
  4. किष्किन्धाकाण्ड
  5. सुंदरकाण्ड
  6. उत्तरकाण्ड
  7. लंकाकाण्ड

श्री मद्गोस्वामी तुलसीदासजी रचित

श्री रामचरितमानस


सुंदरकाण्ड

समुद्र पार करने के लिए विचार

सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा॥
संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँति॥३॥

कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक॥
जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई॥४॥

प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि॥
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि॥५०॥

सखा कही तुम्ह नीति उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई।
मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा॥१॥

नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥
कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा॥२॥

सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा॥
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई॥३॥

प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई॥
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए॥४॥

सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह॥५१॥

प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ॥
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने॥१॥

कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर॥
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए॥२॥

बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे॥
जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना॥३॥

सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोड़ाए॥
रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती॥४॥

कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।
सीता देइ मिलहु न त आवा कालु तुम्हार॥५२॥

तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा॥
कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए॥१॥

बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता॥
पुन कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी॥२॥

करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जव कर कीट अभागी॥
पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई॥३॥

जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा॥
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी॥४॥

—-पीछे आगे—-


सुन्दर काण्ड
  1. मंगलाचरण
  2. श्री हनुमान्‌जी का लंका को प्रस्थान
  3. लंका वर्णन
  4. हनुमान्‌-विभीषण संवाद
  5. श्री हनुमान्‌जी अशोक वाटिका में
  6. श्री सीता-त्रिजटा संवाद
  7. श्री सीता-हनुमान्‌ संवाद
  8. श्री हनुमान्‌जी द्वारा अशोक वाटिका विध्वंस
  9. श्री हनुमान्‌-रावण संवाद
  10. लंकादहन
  11. श्री हनुमान्‌जी का सीताजी से विदा माँगना
  12. श्री राम-हनुमान्‌ संवाद
  13. श्री रामजी का समुद्र तट पर पहुँचना
  14. मंदोदरी-रावण संवाद
  15. रावण को विभीषण का समझाना
  16. विभीषण का श्री रामजी की शरण के जाना
  17. समुद्र पार करने के लिए विचार
  18. दूत का रावण को समझाना
  19. समुद्र पर श्री रामजी का क्रोध
  20. श्री राम गुणगान की महिमा

श्री रामचरितमानस

  1. बालकाण्ड
  2. अयोध्याकाण्ड
  3. अरण्यकाण्ड
  4. किष्किन्धाकाण्ड
  5. सुंदरकाण्ड
  6. उत्तरकाण्ड
  7. लंकाकाण्ड