| क्रान्तिकारी संत मुनि श्री तरुणसागर (Muni Tarunsagar) |
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- धर्म का दुश्मन नास्तिक नहीं बल्कि तथाकथित धर्म के ठेकेदार है । ईश्वर को जितना बदनाम इन तथाकथित ठेकेदारों ने किया है, उतना नास्तिकों ने नहीं । वैसे भी हीरे के दुश्मन कंकर पत्थर कहां होते है, नकली हीरे होते है । यह सच है कि आज खजाने को चोरों से नहीं, पहरेदारों से खतरा है । देश को दुश्मनों से नहीं, गद्दारों से खतरा है । और धर्म को दुश्मनों से नहीं, ठेकेदारों से खतरा है । वे लोग जो धर्म की आड में अपना उल्लू सीधा करते है, धर्म के असली दुश्मन है ।
- सद्गृहस्थ का शाश्वत धर्म यही है कि यदि संत-मुनि तुम्हारे घर नगर आ रहे है तो उनकी अगवानी करो, उनका स्वागत और अभिनन्दन करो । यदि संत-मुनि तुम्हारे घर नगर में ठहरते है तो उनके प्रवास की समुचित व्यवस्था करो । और यदि संत मुनि तुम्हारे नगर से विहार कर रहे है तो उन्हें रोको मत, सहज व प्रसन्न मन से विदा करो क्योंकि वे तुम्हारे ही किसी भाई के कल्याण और मुक्ति के लिये जा रहे है । सद्गुरु एक दीप है । दीप का काम दीयों की बाती को प्रज्ज्वलित करना, उन्हें जगाना और आगे बढ जाना है ।
- बीडी और सिगरेट तो केवल मानव के लिये जहर है लिकिन शराब तो पूरी मानवता के लिये जहर है । नदी, तालाब और समुद्रों में डूबकर अब तक जितने लोग नहीं मरे होंगे उससे भी कही अधिक लोग शराब के छोटे से प्याले में डूबकर मर चुके है । इस अंगूर की बेटी ने पता नहीं कितनी माताओं के बेटों का बेडा गर्क कर रखा है । दुनियां में यदि शराब नाम की चीज न होती तो दुनियां का नक्शा कुछ और ही होता । इस नशे ने व्यक्ति, परिवार, समाज, देश और दुनियां की दशा और दिशा दोनों बिगाड रखी है । शराब पिये तो यह सोचकर पिये कि अब मैं आत्महत्या कर रहा हूँ ।
- आलू बडा, मिर्ची बडा, दही बडा के अलावा आज एक और नाम समाज में आया है और वह है – मैं बडा । गृहस्थ कहता है – मैं बडा । साधु कहता है – मैं बडा । मेरा कहना है कि न गृहस्थ बडा है और न साधु बडा है बल्कि जो इस “मैं बडा” के लफडे से दूर खडा है वह बडा है । गृहस्थ और साधु दोनों अधूरे है क्योंकि दोनों एक दूसरे पर निर्भर है । 23 घंटे गृहस्थ को साधु की जरुरत पडती है तो 1 घंटा साधु को भी (आहार के समय) गृहस्थ की जरुरत पडती है । श्रावक और मुनि धर्म रथ के दो पहिये है और कोई भी रथ एक पहिये से नहीं चलता ।
- हिन्दु और मुसलमान इस देश की दो आंखे है । ये दोनों कौमे खूब प्यार और मुहब्बत के साथ सदियों से कंधे से कंधा और कदम से कदम मिलाकर रहती आ रही हैं । साम्प्रदायिकता इस देश के मिजाज में नहीं है । और हो भी कैसे ? जरा गौर फरमाईये कि जब आप Ramzan लिखते है तो Ram से शुरुआत करते है और जब आप Deewali लिखते है तो Ali से समाप्त करते हैं । तो रमजान में बसे राम और दिवाली में छिपे अली हमें मुहब्बत से रहने का पैगाम देते है । अगर राम के भक्त और रहीम के बंदे थोडी अक्ल से काम ले तो यह मुल्क स्वर्ग से भी सुन्दर है ।
- श्मशान गांव के बाहर नहीं बल्कि शहर के बीच चौराहे पर होना चाहिये । श्मशान उस जगह होना चाहिये जहां से आदमी दिन में दस बार गुजरता है । ताकि जब जब वह वहां से गुजरे तो वहां जलती लाशों और अधजले मुर्दों को देखकर उसे भी अपनी मृत्यु का ख्याल आ जावे । और अगर ऐसा हुआ तो दुनियां के 80 फीसदी पाप और अपराध स्वतः खत्म हो जायेंगे । आज का आदमी भूल गया है कि कल उसे मर जाना है । पर उन मरने वालों में तुम अपने को कहां गिनते हो ।
- पशु मांस का निर्यात देश के अर्थ तंत्र का कत्ल करना है । मांस निर्यात भारत की ऋषि और कृषि परम्परा के माथे पर एक काला कलंक है । सरकार मांस निर्यात अविलम्ब बंद करे और इससे उसे कोई घाटा लगता है तो हम संत मुनि अपने भक्तों से पूरा करवायेंगे । देश से निर्यात ही करना है तो करुणा और अहिंसा का निर्यात करे, दूध और घी का निर्यात करे और यदि यह संभव न हो तो देश में जितने भी भ्रष्ट नेता है, उनका ही निर्यात कर दिया जाये तो यह देश स्वतः ही भ्रष्टाचार से मुक्त हो जायेगा ।
- जीना है तो पूरे जीओ और मरना है तो पूरे मरो । अध मरा और अध जिया आदमी धोबी के उस गधे जैसा है जो न तो घर का होता है और न घाट का । हम में से कई लोग दिन में काम के वक्त उंघते सोते है और रात में जब आराम का समय होता है तब तरह तरह की उधेड बुन में रहते है । मैं पूछता हूँ – क्या यह उचित है ? आज हमारा न तो जागरण पर नियंत्रण रहा और न ही नींद पर । अब हमें नींद के लिये गोली खानी पडती है और जागने के लिये अलार्म भरना पडता है । भारत जैसे धर्म प्राण देश के लिये यह कोई शुभ संकेत नहीं है ।
- सूरज के डूबने और उगने का समय निश्चित है । गाडी के आने और जाने का समय भी निश्चित है । मगर जिंदगी के विषय में कुछ भी निश्चित नहीं है । जीवन की गाडी कभी भी छूट सकती है, अतः चलने की पूरी तैयारी रखे । तैयारी नहीं होगी तो मामला गडबड हो जायेगा । स्कूल जाने से वही बच्चा डरता है, जिसने होम वर्क नहीं किया है । आयकर अधिकारी को देखकर वही व्यापारी घबराता है जिसके बही खाते ठीक नहीं होते । और मौत को अपने करीब आते देख वही व्यक्ति रोता चिल्लाता है जिसकी चलने की तैयारी पूरी नहीं होती है ।
- भगवान के सामने दीप जलाओ तो इस बात का अहंकार मत करना कि मैंने दीप जलाया । अरे ! तुम क्या दीप जलाओगे ? भगवान के सामने कुदरती दो दीप तो जलते ही रहते है – दिन में सूरज और रात में चन्द्रमा । तुम्हारा दीप सूरज और चन्द्रमा का मुकाबला तो नहीं कर सकता ना । तो फिर अहंकार क्यों ? बस इतना ही विचार करना कि हे प्रभू मैं नदी के जल से सागर को पूज रहा हूँ , दीप से सूरज की आरती उतार रहा हूँ । हे प्रभु, तेरा ही तुझको अर्पण कर रहा हूँ ।
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