गर्भावस्था में स्त्री का स्वस्थ रहना बहुत जरुरी है। इस अवस्था में दमा रोग के प्रकोप से मां और बच्चे दोनों की जान को खतरा हो जाता है।
दमा रोग, गर्भावस्था पर इसका प्रभाव और बचाव के उपाय
यह एक वंशानुगत रोग है। इसमें एलर्जिक तत्त्वों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इसके परिणामस्वरुप दमारोगी की श्वास नलियां अधिक संवेदनशील हो जाती है जिससे इनमें सूजन और सिकुडन आ जाती है। एक बार श्वास नलियों के अधिक संवेदनशील हो जाने के बाद संबन्धित एलर्जिक तत्त्व के सम्पर्क मात्र से इन श्वास नलियों में सूजन और सिकुडन आ जाती है। एलर्जिक तत्त्व कुछ भी हो सकते है, जैसे धूल कण, पशु-पक्षियों का मल मूत्र, पंख अथवा बाल, धुआं, तेज गंध, ठंडी हवा, फंगस आदि आदि। स्वस्थ गर्भवती स्त्री को भी हारमोन्स के प्रभाव से गंभीर श्वसन का आभा स होता है, इसे दमा या श्वास रोग न समझे।
नियंत्रित दमा रोग का गर्भावस्था पर कोई विपरित असर नहीं पडता, परन्तु अनियंत्रित दमा रोग शिशु और मां दोनों के लिये खतरनाक हो सकता है।
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