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Archive for the ‘Indian Saints and their Preaches’ Category



क्रान्तिकारी संत मुनि श्री तरुणसागर
(Muni Shri Tarunsagar)
  1. दान देना उधार देने के समान है । देना सीखो क्योंकि जो देता है वह देवता है और जो रखता है वह राक्षस । ज्ञानी तो इशारे से ही देने को तैयार हो जाता है मगर नीच लोग गन्ने की तरह कुटने पिटने के बाद ही देने को राजी होते हैं । जब तुम्हारे मन में देने का भाव जागे तो समझना पुण्य का उदय आया है । अपने होश हवास में कुछ दान दे डालो क्योंकि जो दे दिया जाता है वह सोना हो जाता है और बचा लिया जाता है वह मिट्टी हो जाता है । भिखारी भी भीख में मिली हुई रोटी तभी खाये जब उसका एक टुकडा कीडे मकोडों को डाल दे । अगर वह ऐसा नहीं करेगा तो कई जन्मों तक भिखारी ही रहेगा । Read the rest of this entry »

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क्रान्तिकारी संत मुनि श्री तरुणसागर
(Muni Shri Tarunsagar)

  1. 50 वर्ष के बाद भोजन बदल देना चाहिये । 100 वर्ष के बाद मकान को गिरा देना चाहिये । 500 वर्ष बाद मंदिर और मस्जिद ढहा देना चाहिये । 1000 वर्ष धर्म में आग लगा देनी चाहिये । 100 वर्ष के बाद मकान की डिजाइन पुरानी हो जाती है । 500 वर्ष बाद मंदिर और मस्जिद अपने मूल उद्देश्य से भटक जाते है और 1000 वर्ष के अन्तराल के बाद धर्म में भी कूडा कचरा इकट्ठा हो जाता है । आज हर धर्म के साथ लगभग यहीं हुआ है और यही कारण है कि वह समस्याओं का समाधान नहीं दे पा रहा है । Read the rest of this entry »

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क्रान्तिकारी संत मुनि श्री तरुणसागर (Muni Tarunsagar)

  1. मनुष्य की चुसने की आदत (habit) बहुत पुरानी है । जब वह पैदा हुआ तो पैदा होते ही मां का स्तन चूसने लगा । फिर थोडा बडा हुआ तो अंगूठा (thumb) चूसने लगा । फिर थोडा और बडा हुआ तो आम और गन्ना चूसने लगा । और जब पूरा बडा हुआ तो मनुष्य का खून (blood) चूसने लगा । मच्छर और मनुष्य दोनों चूसते है फिर भी मच्छर से मनुष्य ज्यादा खतरनाक है । कारण कि मच्छर काटता है तो सिर्फ खून पीता है, लेकिन मनुष्य जब काटता है तो पूरा खानदान तक पी जाता है । मनुष्य को अगर ऊंचा उठना है तो चूसने और काटने की आदत छोडनी होगी ।
  2. आज कुछ लोगों के द्वारा धर्म और मज़हब के नाम पर, जाति और भाषा के नाम पर, देश (country) और दुनियां (world) को बांटा जा रहा है । ऐसे बांटनेवालों को मैं मुनि तरुणसागर चुनौती देता हूँ कि ऐ बांटने वाले इंसानों तुमने लकीर खींचकर जमीन को तो बांट दिया लेकिन मैं तुम्हारी शक्ति उस दिन मानूंगा जिस दिन तुम आसमान में लकीर खींचकर दिखाओगे कि यह हिंदु की हवा है और यह मुसलमान की हवा है । अगर तुममें ताकत है तो जरा समय को हिंदु और मुसलमान के बीच बांटकर दिखाओ ।
  3. अब संत मुनियों को अपने प्रवचन साधारण जनता के बीच करने की अपेक्षा लोकसभा और विधानसभाओं में करना चाहिये क्योंकिं खतरनाक लोग वहीं मौजूद है । मेरा विश्वास है अगर देश और प्रदेश की राजधानियों में बैठे करीब 10000 लोग सुधर जाएं तो देश की 100 करोड जनता आपों-आप रातों-रात सुधर जायेगी । सुधार की प्रक्रिया नीचे से नहीं, ऊपर से शुरु होनी चाहिये क्योंकि भ्रष्टाचार की गंगोत्री ऊपर से नीचे की ओर बहती है । अगर ऋषिकेश में गंगा का शुद्धिकरण हो जाये तो हरिद्वार और उसके नीचे के तमाम घाट स्वतः शुद्ध होते चले जायेंगे ।
  4. मैं तुमसे नोट मांगने नहीं आया हूँ । वोट और सपोर्ट मांगने भी नहीं आया हूँ । मैं तुमसे सिर्फ तुम्हारी खोट मांगने आया हूँ । वे खोट जो तुम्हें रात को सोने नहीं देते । वे खोट जो तुम्हें दीन-हीन बनाये हुये हैं । वे खोट जो तुम्हारे मां-बाप को, तुम्हारी पत्नी और बच्चों को सिर उठाकर चलने नहीं देते । मैं, मुनि तरुणसागर तुम्हारे दिल के दरवाजे पर झोली फैलाये खडा हूं । मेरी इस झोली में डाल दो जीवन की तमाम खोटे व बुराइयां और पा लो अपने जीवन का असली स्वर्ग । बस यही मेरी गुरु-दक्षिणा होगी ।
  5. बच्चों के पैर चंचल होते है । जवान व्यक्ति का रोम रोम चंचल होता है । और बूढे व्यक्ति की जुबान चंचल होती है । बूढे आदमी को नपा-तुला बोलना चाहिये । अपने बहू-बेटों को अनावश्यक सलाह नहीं देना चाहिये । बूढे व्यक्ति को अपने मुख से या तो आशीर्वाद के शब्द निकालना चाहिये या फिर मौन रहना चाहिये । तुम्हारा बेटा- बहू, पोता-पोती कुछ भी अच्छा करे तो उन्हें शाबाशी दो । बार बार टोका टोकी मत करो । कहो – बहुत अच्छा बेटा ! तुमसे यहीं उम्मीद थी । हमेशा खुश रहो । बुजुर्गों ! अगर तुमने ऐसा किया तो तुम्हारा बुढापा सुख से कट जायेगा ।
  6. किसी की अर्थी को सडक से गुजरते हुये देखकर यह मत कहना कि बेचारा चल बसा । अपितु अर्थी को देखकर सोचना कि एक दिन मेरी अर्थी भी इन्हीं रास्तों से यों ही गुजरेगी और लोग सडक के दोनों ओर खडे होकर देखते रह जायेंगे । उस अर्थी से अपनी मृत्यु का बोध ले लेना क्योंकि दूसरों की मौत तुम्हारे लिये एक चुनौती है । अर्थी उठने से पहले जीवन का अर्थ समझ लेना, वर्ना बडा अनर्थ हो जायेगा । वैसे गधे को कभी नहीं लगता कि उसका जीवन व्यर्थ है ।
  7. दुनियां में ऐसा आदमी खोजना मुश्किल है, जिसने जिंदगी में दो-चार बार आत्महत्या का विचार न किया हो और ऐसी पत्नी खोजना भी मुश्किल है जिसने एकाध बार अपने पति को चकमा देलर उसकी जेब से पैसे न चुराये हो । दरअसल दुनियां में सब चोर है । फर्क सिर्फ इतना है कि जिन्होंने बडी बडी चोरियां की, वे बडे उद्योगपति बन गये । जिन्होंने छोटी चोरियां की वे छोटे व्यापारी हो गये । और जिन्हें चोरी करने का मौका नहीं मिला वे तथाकथित ईमानदार हो गये । हम मजबूर ईमानदार है और ऐसे मजबूर ईमानदारों से देश का भला होने वाला नहीं है ।
  8. दो बातों का ध्यान रखें । एक टीवी देखते हुये भोजन न करे । दो-अखबार पढते हुये चाय न पीये । आज के जीवन में ये दो जबरदस्त बुराइयां है । आप इन्हें अविलम्ब सुधार ले क्योंकि जब आप टीवी देखते हुये खाना खाते है और अखबार पढते हुये चाय पीते है तो आप सिर्फ खाना और चाय नहीं खाते पीते बल्कि टीवी और अखबार में हो हिंसा, अश्लीलता और भ्रष्टाचार की खबरें होती है उन्हें भी खा पी जाते है । और फिर वे खबरे आपको अपने से बेखबर कर देती है । अगर आम आदमी अपनी ये दो आदतें सुधार ले तो पूरे समाज व देश की आबो-हवा बदल सकती है ।
  9. जिंदगी में डोली दो बार सजती है । एक दुल्हन के लिये, दूसरी मुर्दे के लिये । मैं मुनि तरुणसागर तो सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि डोली सजा के रखने वालों जिंदगी में अपनी अर्थी को भी सजा के रखना । कारण कि पता नहीं कब मौत आ जाये और अर्थी पर चढना पड जाये । जो जीते जी अपनी अर्थी को सजा लेते है केवल वे ही जीवन का अर्थ समझ पाते है । लोग तो चूंकि अभी सांस चल रही है इसलिये जी रहे है । चूंकि आत्महत्या नहीं कर सकते इसलिये जी रहे हैं । जीने के पीछे कोई महान उद्देश्य न हो तो जीवन व्यर्थ होता है ।
  10. जिंदा रहने के लिये भोजन जरुरी है । भोजन से भी ज्यादा पानी जरुरी है । पानी से भी ज्यादा वायु जरुरी है । वायु से भी ज्यादा आयु जरुरी है । मगर मरने के लिये कुछ भी जरुरी नहीं है । आदमी यों ही बैठे बैठे मर सकता है । आदमी केवल दिमाग की नस फटने और दिल की धडकन रुकने से नहीं मरता बल्कि उस दिन भी मर जाता है जिस दिन उसकी उम्मीदें और सपने मर जाते है । उनका विश्वास मर जाता है । इस तरह आदमी मरने से पहले भी मर जाता है और फिर मरा हुआ आदमी दोबारा थोडे न मरता है ।

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क्रान्तिकारी संत मुनि श्री तरुणसागर (Muni Tarunsagar)

  1. आज मैचिंग का जमाना है । ऊपर से नीचे और आगे से पीछे सब ओर मैचिंग चल रही है । वस्त्रों और गहनों के मैचिंग के इस दौर में आज एक और मैचिंग जरुरी हो गई है । वह है स्वभाव ( Nature) की मैचिंग । अगर तुम परिस्थियों और वातावरण के अनुसार अपने आपको नहीं ढाल सकते तो फिर तुम्हें आत्महत्या कर लेनी चाहिये, क्योंकि यह दुनियां तुम्हारे रहने के लायक नहीं है । तुम्हारे सामने दो ही विकल्प है- या तो अपने को बदलिये या फिर आत्महत्या के लिये तैयार हो जाइये ।
  2. भारत उस मां की तरह है जो अपनी संतान को अपने खून से सींचकर और अपने आंचल का दूध पिलाकर पालती पोसती है और यही कारण है कि दुनियां ने भारत को माता कहा । भारत माता । दुनियां में सिर्फ भारत को ही माता कहा जाता है । लंदन माता है, अमरीका माता है ऐसा तुमने कभी नहीं सुना होगा । मैं माताओं बहनों से आव्हान करूंगा कि वे अपनी कोख से दो की जगह तीन बच्चे पैदा करे । दो बच्चे अपने लिये रखे और तीसरे बच्चे को राष्ट्र और धर्म के लिये भारत-माता को समर्पित कर दें ।
  3. अगर तुम चहते हो कि मरने के बाद तुम्हें भुला न दिया जाय तो इसके लिये दो में से कोई एक काम जरुर करो । या तो पढने लायक कुछ लिख डालो या लिखने लायक कुछ कर डालो । दुनियां में कोई भी इंसान या तो अपने कृत्यों के लिये याद किया जाता है या फिर अपनी बहुमूल्य कृतियों के लिये । जो व्यक्ति समय की धारा के साथ चलते रहते है उन्हें इतिहास समय के साथ भुला देता है लेकिन जो व्यक्ति समय की धारा को मोड देता है इतिहास भी उनके साथ हो लेता है । गंगोत्री से गंगा-सागर की यात्रा तो मुर्दा भी कर लेता है । भुजाओं का बल तो गंगा-सागर से गंगोत्री की यात्रा पर निकल पडना है ।
  4. अगर आप गृहस्थ है, शादी शुदा है तो आपके घर एक लडकी तो होनी ही चाहिये । लडका ना भी हो तो चलेगा, मगर लडकी तो होनी ही चाहिये क्योंकि जिसके लडकी नहीं होती उसके पास दिल भी नहीं होता । ऐसा आदमी प्रायः अहंकारी होता है – कहता है हमारे तो कोई लडकी है ही नहीं । अतः हमें किसी के सामने झुकने और हाथ फैलाने की जरुरत ही नहीं है । लडकी तुम्हारे अहंकार के लिये एक चुनौती है । लडकी मंगल है । कन्हैया को किसी भी शास्त्र में मंगल नहीं कहा ।
  5. कोई धर्म बुरा नहीं है, बल्कि सभी धर्मों में कुछ बुरे लोग जरुर है जो अपने स्वार्थों की खातिर धर्म की आड में अपने गोरख धंधे और नापाक इरादे जाहिर करते रहते है । अगर हम इन थोडे से बुरे लोगों के दिलों को बदल सके, उन्हें सही राह पर चला सके और नेक इंसान बनाकर जीना सिखा सके तो यकीनन सच मानिये यह पूरी पृथ्वी स्वर्ग में तब्दील हो जायेगी । धर्म मरहम नहीं, बल्कि टॉनिक है । इसे बाहर मलना नहीं, बल्कि पी जाना है । कितना आश्चर्य है कि हम धर्म के लिये लडेंगे मरेंगे लेकिन उसे जियेंगे नहीं ।
  6. धर्म पगडी नहीं, जिसे घर से दुकान के लिये चले तो पहन लिया और दुकान पर जाकर उतार कर रख दिया । धर्म तो चमडी है जिसे अपने से अलग नहीं किया जा सकता । धर्म तो आत्मा का स्वभाव है । धर्म के माने प्रेम, करुणा और सद्भावना है । उसका प्रतीक फिर चाहे राम हो या रहीम, बुद्ध हो या महावीर, कृष्ण हो या करीम, सबकी आत्मा में धर्म की एक ही आवाज होगी । धर्म दीवार नहीं, द्वार है । लेकिन दीवार जब धर्म बन जाती है तो अन्याय और अत्याचार को खुलकर खेलने का अवसर मिल जाता है । फिर चाहे वह दीवार मंदिर की हो या मस्जिद की ।
  7. तुम एक परदेशी हो । एक दिन तुम्हें अपने देश वापस लौटना है । अभी तुम यहां पर्यटन पर आये हुये हो । पर्यटक संभल संभल कर रहता है । वह किसी से झगडता नहीं है । सबकी मीठी यादें साथ रखता है क्योंकि उसे पता है कि उसे वापस जाना है । और हां, वह सुबह शाम अपने घर फोन जरुर करता है । घर परिवार के समाचार जरुर ले लेता है । तुम भी तो भगवान के घर से आये हो न । जरा सुबह शाम फोन करके अपने घर के समाचार लेते रहना । सुबह शाम प्रभु की प्रार्थना करना फोन करके अपने घर के हाल चाल पूछने जैसा है ।
  8. जिस घर में और सब कुछ हो मगर प्रेम न हो वह घर घर नहीं, श्मशान है । श्मशान में भी बहुत मुर्दें होते है मगर वे आपस में न तो कभी मिलते है और न ही बतियाते है । जिस घर में पति-पत्नी, सास-बहू, बाप-बेटे साथ रहते हो मगर एक दूसरे को देखकर मुस्कराते न हों तो क्या वह घर भी श्मशान नहीं है । परिवार में प्रेम और समर्पण है तो जीवन स्वर्ग है । मैं पूछता हूँ – प्रेम से भी बडा क्या दुनियां में कोई स्वर्ग है और घृणा और नफरत से बडा क्या दुनियां में कोई नरक है ?
  9. चलते रहना संत जीवन की चर्या है । संत कहीं से चलता है और कहीं पहुंच जाता है । मगर इस चलने और पहुंचने में एक घटना घटती है कि संत जहां से चल देता है वहां सब सूना-सूना हो जाता है और जहां पहुंच जाता है वहां सब सोना-सोना हो जाता है । संत और संसारी में इतना ही तो फर्क होता है कि संसारी का मन कहीं नहीं टिकता और संत के पैर कहीं नहीं टिकते । बहता हुआ जल और चलता फिरता संत हमेशा पवित्र होता है ।
  10. दुनियां में सज्जन और दुर्जन दो तरह के मनुष्य होते है । दोनों जीते हैं मगर दोनों में फर्क केवल इतना होता है कि सज्जन दूसरों को हंसाकर जीता है और दुर्जन रुलाकर जीता है । जब दोनों दुनियां से विदा लेते है तो सज्जन लोगों को रुलाकर जाता है और दुर्जन हंसाकर जाता है । जीवन ऐसा जीना कि जब तुम दुनियां से जाओ तो लोग तुम्हारे लिये रोये, तुम्हें याद करे । ऐसा जीवन मत जीना कि लोग कहे कि अच्छा हुआ, एक पाप और कटा । दुनियां से जाओ तो लोगों के दिलों में मीठी यादें और आंखों में प्यार के आंसू छोडकर जाना ।

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धर्म का दुश्मन..

Posted by cls On July - 13 - 2009
क्रान्तिकारी संत मुनि श्री तरुणसागर (Muni Tarunsagar)

  1. धर्म का दुश्मन नास्तिक नहीं बल्कि तथाकथित धर्म के ठेकेदार है । ईश्वर को जितना बदनाम इन तथाकथित ठेकेदारों ने किया है, उतना नास्तिकों ने नहीं । वैसे भी हीरे के दुश्मन कंकर पत्थर कहां होते है, नकली हीरे होते है । यह सच है कि आज खजाने को चोरों से नहीं, पहरेदारों से खतरा है । देश को दुश्मनों से नहीं, गद्दारों से खतरा है । और धर्म को दुश्मनों से नहीं, ठेकेदारों से खतरा है । वे लोग जो धर्म की आड में अपना उल्लू सीधा करते है, धर्म के असली दुश्मन है ।
  2. सद्गृहस्थ का शाश्वत धर्म यही है कि यदि संत-मुनि तुम्हारे घर नगर आ रहे है तो उनकी अगवानी करो, उनका स्वागत और अभिनन्दन करो । यदि संत-मुनि तुम्हारे घर नगर में ठहरते है तो उनके प्रवास की समुचित व्यवस्था करो । और यदि संत मुनि तुम्हारे नगर से विहार कर रहे है तो उन्हें रोको मत, सहज व प्रसन्न मन से विदा करो क्योंकि वे तुम्हारे ही किसी भाई के कल्याण और मुक्ति के लिये जा रहे है । सद्गुरु एक दीप है । दीप का काम दीयों की बाती को प्रज्ज्वलित करना, उन्हें जगाना और आगे बढ जाना है ।
  3. बीडी और सिगरेट तो केवल मानव के लिये जहर है लिकिन शराब तो पूरी मानवता के लिये जहर है । नदी, तालाब और समुद्रों में डूबकर अब तक जितने लोग नहीं मरे होंगे उससे भी कही अधिक लोग शराब के छोटे से प्याले में डूबकर मर चुके है । इस अंगूर की बेटी ने पता नहीं कितनी माताओं के बेटों का बेडा गर्क कर रखा है । दुनियां में यदि शराब नाम की चीज न होती तो दुनियां का नक्शा कुछ और ही होता । इस नशे ने व्यक्ति, परिवार, समाज, देश और दुनियां की दशा और दिशा दोनों बिगाड रखी है । शराब पिये तो यह सोचकर पिये कि अब मैं आत्महत्या कर रहा हूँ ।
  4. आलू बडा, मिर्ची बडा, दही बडा के अलावा आज एक और नाम समाज में आया है और वह है – मैं बडा । गृहस्थ कहता है – मैं बडा । साधु कहता है – मैं बडा । मेरा कहना है कि न गृहस्थ बडा है और न साधु बडा है बल्कि जो इस “मैं बडा” के लफडे से दूर खडा है वह बडा है । गृहस्थ और साधु दोनों अधूरे है क्योंकि दोनों एक दूसरे पर निर्भर है । 23 घंटे गृहस्थ को साधु की जरुरत पडती है तो 1 घंटा साधु को भी (आहार के समय) गृहस्थ की जरुरत पडती है । श्रावक और मुनि धर्म रथ के दो पहिये है और कोई भी रथ एक पहिये से नहीं चलता ।
  5. हिन्दु और मुसलमान इस देश की दो आंखे है । ये दोनों कौमे खूब प्यार और मुहब्बत के साथ सदियों से कंधे से कंधा और कदम से कदम मिलाकर रहती आ रही हैं । साम्प्रदायिकता इस देश के मिजाज में नहीं है । और हो भी कैसे ? जरा गौर फरमाईये कि जब आप Ramzan लिखते है तो Ram से शुरुआत करते है और जब आप Deewali लिखते है तो Ali से समाप्त करते हैं । तो रमजान में बसे राम और दिवाली में छिपे अली हमें मुहब्बत से रहने का पैगाम देते है । अगर राम के भक्त और रहीम के बंदे थोडी अक्ल से काम ले तो यह मुल्क स्वर्ग से भी सुन्दर है ।
  6. श्मशान गांव के बाहर नहीं बल्कि शहर के बीच चौराहे पर होना चाहिये । श्मशान उस जगह होना चाहिये जहां से आदमी दिन में दस बार गुजरता है । ताकि जब जब वह वहां से गुजरे तो वहां जलती लाशों और अधजले मुर्दों को देखकर उसे भी अपनी मृत्यु का ख्याल आ जावे । और अगर ऐसा हुआ तो दुनियां के 80 फीसदी पाप और अपराध स्वतः खत्म हो जायेंगे । आज का आदमी भूल गया है कि कल उसे मर जाना है । पर उन मरने वालों में तुम अपने को कहां गिनते हो ।
  7. पशु मांस का निर्यात देश के अर्थ तंत्र का कत्ल करना है । मांस निर्यात भारत की ऋषि और कृषि परम्परा के माथे पर एक काला कलंक है । सरकार मांस निर्यात अविलम्ब बंद करे और इससे उसे कोई घाटा लगता है तो हम संत मुनि अपने भक्तों से पूरा करवायेंगे । देश से निर्यात ही करना है तो करुणा और अहिंसा का निर्यात करे, दूध और घी का निर्यात करे और यदि यह संभव न हो तो देश में जितने भी भ्रष्ट नेता है, उनका ही निर्यात कर दिया जाये तो यह देश स्वतः ही भ्रष्टाचार से मुक्त हो जायेगा ।
  8. जीना है तो पूरे जीओ और मरना है तो पूरे मरो । अध मरा और अध जिया आदमी धोबी के उस गधे जैसा है जो न तो घर का होता है और न घाट का । हम में से कई लोग दिन में काम के वक्त उंघते सोते है और रात में जब आराम का समय होता है तब तरह तरह की उधेड बुन में रहते है । मैं पूछता हूँ – क्या यह उचित है ? आज हमारा न तो जागरण पर नियंत्रण रहा और न ही नींद पर । अब हमें नींद के लिये गोली खानी पडती है और जागने के लिये अलार्म भरना पडता है । भारत जैसे धर्म प्राण देश के लिये यह कोई शुभ संकेत नहीं है ।
  9. सूरज के डूबने और उगने का समय निश्चित है । गाडी के आने और जाने का समय भी निश्चित है । मगर जिंदगी के विषय में कुछ भी निश्चित नहीं है । जीवन की गाडी कभी भी छूट सकती है, अतः चलने की पूरी तैयारी रखे । तैयारी नहीं होगी तो मामला गडबड हो जायेगा । स्कूल जाने से वही बच्चा डरता है, जिसने होम वर्क नहीं किया है । आयकर अधिकारी को देखकर वही व्यापारी घबराता है जिसके बही खाते ठीक नहीं होते । और मौत को अपने करीब आते देख वही व्यक्ति रोता चिल्लाता है जिसकी चलने की तैयारी पूरी नहीं होती है ।
  10. भगवान के सामने दीप जलाओ तो इस बात का अहंकार मत करना कि मैंने दीप जलाया । अरे ! तुम क्या दीप जलाओगे ? भगवान के सामने कुदरती दो दीप तो जलते ही रहते है – दिन में सूरज और रात में चन्द्रमा । तुम्हारा दीप सूरज और चन्द्रमा का मुकाबला तो नहीं कर सकता ना । तो फिर अहंकार क्यों ? बस इतना ही विचार करना कि हे प्रभू मैं नदी के जल से सागर को पूज रहा हूँ , दीप से सूरज की आरती उतार रहा हूँ । हे प्रभु, तेरा ही तुझको अर्पण कर रहा हूँ ।

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आप घर के बाहर भले ही …..

Posted by cls On September - 7 - 2008
क्रान्तिकारी संत मुनि श्री तरुणसागर (Muni Tarunsagar)
  1. आप घर से बाहर भले ही डॉक्टर,doctor वकील,advocate व्यापारी businessman और बुद्धिजीवी बने रहे लेकिन शाम को जब घर पहुंचे तो अपने पेशे को बाहर छोडकर ही घर में प्रवेश करें । कारण कि वहां तुम्हारे दिमाग की नहीं दिल की जरुरत है । Read the rest of this entry »

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मन ही बन्धन और मोक्ष का कारण है
(गोलोकवासी परम भागवत संत श्रीरामचन्द्र केशव डोंगरेजी महाराज)
(कल्याण दिसम्बर २००५ से साभार)

आत्मा के लिये कोई वास्तविक सुख दुःख नहीं होता. सुख दुःख मन में ही होते है. सुख दुःख मन का धर्म है. मन में सुख दुःख होने पर आत्मा कल्पना करती है कि मुझे दुःख होता है.मन पर हुये सुख दुःख का आरोप अज्ञान से आत्मा अपने पर करती है. Read the rest of this entry »

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समय अमूल्य है ..

Posted by cls On September - 4 - 2008
क्रान्तिकारी संत मुनि श्री तरुणसागर (Muni Tarunsagar)
  1. समय अमूल्य है । जिंदगी में एक वर्ष का क्या महत्त्व है ? यह इसी वर्ष फेल हुये विद्यार्थी से पूछिये । एक माह का महत्त्व जानना हो तो उस माँ से पूछिये जिसने अठ-मासिया बच्चे को जन्म दिया है । सात दिन का महत्त्व जानने के लिये किसी साप्ताहिक पत्र के सम्पादक से मिलिये । Read the rest of this entry »

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क्रान्तिकारी संत मुनि श्री तरुणसागर (Muni Tarunsagar)
  1. जिंदगी में केवल चार दिन है और वे चार दिन भी दो आरजू और दो इन्तजार मे कट जाते है । इससे आगे बढें तो इंसान की सिर्फ दो दिन की कुल जिंदगी है और उन दो दिनों में एक दिन मौत का होता है, अब बचा केवल एक दिन । और पता नहीं इस एक दिन की जिंदगी पर आदमी इतना क्यों अकडता हैं ? Read the rest of this entry »

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संत कबीर

Posted by cls On September - 2 - 2008

कबीरदास : जीवन परिचय


Kabir, the Weaver Saint of Benares

काशी के इस अक्खड़, निडर एवं संत कवि का जन्म लहरतारा के पास सन् १२९७ में ज्येष्ठ पूर्णिमा को हुआ। जुलाहा परिवार में पालन पोषण हुआ, संत रामानंद के शिष्य बने और अलख जगाने लगे। कबीर सधुक्कड़ी भाषा में किसी भी सम्प्रदाय और रुढियों की परवाह किये बिना खरी बात कहते थे। हिंदू-मुसलमान सभी समाज में व्याप्त रुढिवाद तथा कट्टपरंथ का खुलकर विरोध किया। Read the rest of this entry »

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