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Archive for the ‘Religion and Philosophy’ Category


व्रत कब एवं कैसे करें

Posted by cls On December - 26 - 2010

व्रत कब एवं कैसे करेंरोग, दुख, संकट तथा आपदाओं से छुटकारा पाने के लिए प्राय: व्रत उपवास किए जाते हैं जो कि वार अनुसार अलग-अलग होते हैं।

रविवार व्रत
रविवार का व्रत किसी भी माह के शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार से करके 12, 30 या 54 व्रत करें। व्रत के दिन भोजन में गेहूं की रोटी, हलवा, गुड़, घी या इलायची का सेवन कर सकते हैं। रविवार के दिन रक्त चंदन का तिलक करके ‘आदित्य ह्वदयस्तोत्र’ का जप करें। सूर्यास्त से पहले भोजन करें।

सोमवार व्रत
सोमवार का व्रत चैत्र, वैशाख, श्रावण, कार्तिक या मार्गशीर्ष  मास के शुक्ल पक्ष में प्रथम सोमवार से आरंभ कर 54 व्रत लगातार करें । सोमवार के दिन दूध, दही, खीर के 7 ग्रास खाएं तत्पश्चात अन्य पदार्थ ग्रहण करें। व्रत वाले दिन स्नान करके श्वेत चंदन का तिलक करें, श्वेत वस्त्र धारण करें। तत्पश्चात शिव की पूजा करें। Read the rest of this entry »

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THE IMPORTANCE OF FOUR

Posted by cls On August - 17 - 2009
  1. REMEMBER FOUR THINGS:
    a) To respect the elders
    b) To protect and love the young
    c)To take advice from the intelligent
    d) To never quarrel with foolish persons.
  2. FOUR THINGS SEEM WEAK INITIALLY, BUT IF NEGLECTED CAUSES SORROW:
    a) Fire   
    b) disease   
    c) debt   
    d) sin.
  3. PRACTICE FOUR THINGS:
    a) Being in company of learned and wise men
    b) Contentment   
    c) Charity   
    d) Compassion.
  4. FOUR THINGS INTOXICATES A MAN:
    a) Youth   
    b) Wealth   
    c) Power   
    d) Imprudence.
  5. FORTUNATE TO HAVE FOUR THINGS:
    a) Having devotion to God
    b) Being in company of learned
    c) Purity of charater
    d) Magnanimity.
  6. FOUR QUALITIES ARE RARE:
    a) Wealth acquired by pure means
    b) Modesty in charity
    c) Kindness in Bravery
    d) Humbleness in Authority.
  7. DONT BELIEVE IN FOUR THINGS:
    a) Unconquered Mind
    b) Love of an enemy
    c) Flattery of a selfish man
    d) Road side Astrologer.
  8. REMEMBER FOUR THINGS:
    a) Favour done by others to you
    b) Ill-treating others   
    c) Death   
    d) God.
  9. AVOID FOUR THINGS :
    a) An Atheist
    b) Wealth accumulated through wrong means
    c) Women other than your own wife
    d) Criticizing others.
  10. NO CONTROL OVER FOUR THINGS:
    a) LIFE   
    b) DEATH   
    c) FAME   
    d) UNPOPULARITY.
  11. FOUR THINGS ARE TRULY RECOGNIZED IN FOUR SITUATIONS:
    a) Friend in Poverty
    b) Wife in Penury and Indigence
    c) Bravery in a battlefield
    d) Relatives in Notoriety.
  12. BENEDICTION IN FOUR THINGS:
    a) Control over speech
    b) Little sleep   
    c) Little food   
    d) Remembering God in solitude.

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MONEY OR WEALTH (WHAT IT CAN BUY)

Posted by cls On August - 16 - 2009
  1. Wealth can purchase a ‘bed‘ but not ‘sleep‘.
  2. Wealth can purchase ‘books‘ but not ‘knowledge‘.
  3. Wealth can purchase ‘foodstuffs‘ but not the power of ‘digestion‘.
  4. Wealth can purchase ‘medicines‘ but not ‘health‘.
  5. Wealth can purchase a ‘house‘ but not a ‘home‘.
  6. Wealth can purchase ‘luxuries‘ but not ‘civilization‘.
  7. Wealth can purchase ‘pleasures‘ but not ‘happiness‘.
  8. Wealth can purchase ‘cosmetics‘ but not ‘Beauty‘.
  9. Wealth can purchase a ‘temple‘ but not ‘purity‘.
  10. Wealth can purchase an ‘obedient attendant‘ but not ‘respect’.
  11. Wealth can purchase a ‘servant’ but not a ‘friend’.
  12. Wealth can purchase ‘Positions’ but not ‘equality’.
  13. Wealth can purchase ‘sensual pleasures’ but not ‘love’.
  14. Wealth can purchase ‘MEN’ but not ‘BELIEF’.
  15. Wealth can purchase ‘commodities’ but not ‘PEACE’.
  16. Wealth can purchase ‘social status’ but not ‘nobility‘.
  17. Wealth can purchase ‘credit’ but not ‘respect’.
  18. Wealth can purchase ‘titles’ but not ‘greatness’.
  19. Wealth can purchase ‘service’ but not respect for the ‘MASTER’.
  20. Wealth can purchase ‘power’ but not ‘influence’.
  21. Wealth can purchase a ‘human’ but not ‘humanity’.

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शोक के प्रसंग में यह निश्चय करो कि मेरे लिये कभी शोक का प्रसंग नहीं आ सकता। प्रकृति जादूभरी और परिवर्तनशील है। इसमें पैदा होने और नष्ट होने का खेल सदा होता ही रहता है। रूप बदलता है, मूल वस्तु कभी नष्ट नहीं होती, फिर मैं शोक क्यों करुं? अथवा यह निश्चय करो कि मेरे स्वामी भगवान जो कुछ विधान करते है, उसी में मेरा परम कल्याण है और यही सत्य है। शोक करना स्वामी के विधान पर असन्तोष प्रकट करना है और सर्वथा अनुचित है, वस्तुतः भगवान हमारी भलाई के लिये ही सब कुछ करते है।

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बुरे संग से सदा दूर रहो। बुरी जगह , बुरा अन्न, बुरा ग्रन्थ, बुरा दृश्य, बुरी बात, बुरा वातावरण ये सभी बुरे संग हैं। जब लगातार के बुरे संग से बुरे परमाणुओं के द्वारा अन्दर के अच्छे परमाणु दब जाते है तब बुरी बाते स्वाभाविक ही अच्छी मालूम होने लगती है। जैसा मन होता है वैसी ही दृष्टि होती है और जैसी दृष्टि होती है वैसा ही दृश्य दीखता है। साधु को प्रायः सभी साधु दिखते है, चोर को चोर दिखते है, कमी को कामी और लोभी को लोभी दिखते है।

बुरे वातावरण मे रहते रहते चित्त बुरा हो जाता है और उसमें बुरे संकल्प उठते है। जिसके चित्त में बुरे संकल्प उठते है उसके समान दुःखी तथा अपराधी और कौन होगा क्योंकि वह अपने चित्त के बुरे संकल्पों को जगत में फैलाकर दूसरों को भी बुरा बनाता है।

मन में ऐसा निश्चय करो कि मेरे चित्त में मभी बुरी कल्पना नहीं आ सकती, मैं पवित्र हूं, भगवान की कृपा से मेरा ह्रुदय शुद्ध हो गया है। सर्वशक्तिमान् भगवान का अभय हाथ सदा मेरे सिर पर है। मैं उनकी छत्रछाया में हूं। पाप ताप मेरे पास नहीं आ सकते।

असवस्थ होने पर यह निश्चय करो कि बीमारी शरीर को है। मैं तो नित्य निरामय हूं। मुझको कभी कोई रोग नहीं हो सकता। मैं सबका दृष्टा हूं। शरीर क्षणभंगुर है, नाशवान है, किसी दिन नष्ट होगा ही। मैं अज हूं, अविनाशी हूं, अमर हूं।

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अहंकार से मुक्ति

Posted by cls On January - 15 - 2009

विद्वता और तेजस्विता के लिए प्रसिद्ध अंगिरा ऋषि के मार्गदर्शन में उनके अनेक शिष्य ज्ञान प्राप्त कर अपना जीवन सफल बनाने की साधना करते थे। उनके एक अत्यंत प्रतिभावान शिष्य उदयन से ऋषि अत्यंत स्नेह रखते थे। एक बार ऋषि ने महसूस किया कि उदयन के व्यवहार में परिवर्तन आ रहा है। उसमें न सिर्फ अहंकार आने लगा था, बल्कि वह आलस्य का भी शिकार होता जा रहा था। ऋषि इससे दुखी थे और उन्होंने उदयन को इन दुष्प्रवृत्तियों से बाहर निकालने के लिये एक तरकीब सोची।

एक रात उदयन के साथ किसी विषय पर चर्चा करते समय अचानक चर्चा रोककर उन्होंने उदयन से कहा, ‘वत्स, सामने रखी अंगीठी में झांक कर देखो, कोयला दहकने के कारण कितना तेजस्वी लग रहा है। इसे निकालकर मेरे सामने रख दो जिससे मैं पास से इसकी तेजस्विता का अवलोकन कर सकूं।’ उदयन ने उनके आदेश का पालन करते हुए कोयले को अंगीठी से निकालकर उनके समीप रख दिया। कुछ ही क्षणों में दहकता हुआ कोयला अंगारे की जगह राख में परिवर्तित हो गया।

दहकते हुए अंगारे को राख में परिवर्तित होते देख ऋषि उदयन से बोले, ‘वत्स देखो, अंगीठी का सबसे चमकदार कोयला जिस प्रकार अग्नि के तेज से विमुख होते ही राख बन गया, उसी प्रकार सक्रिय और प्रतिभावान व्यक्ति भी अभ्यास, स्वाध्याय, विनम्रता, नेकी व सक्रियता से विमुख होते ही आलस्य तथा अहंकार का शिकार होकर निस्तेज व गुणविहीन हो जाता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को इस बात को अपने हृदय में बसा लेना चाहिए कि सफलता, अभ्यास, ज्ञान, सक्रियता व बुद्धिमत्ता ही किसी व्यक्ति के जीवन को सार्थक बनाती है। इन गुणों को अपनाकर ही उल्लेखनीय सफलता हासिल की जा सकती है। अहंकार व आलस के व्यक्ति पर हावी होते ही वह इन गुणों से युक्त होते हुए भी गुणरहित होता है और ऐसे व्यक्ति की छवि धीरे-धीरे धूमिल होती जाती है।’ उदयन अपने गुरु का आशय समझ कर तत्परता से विद्याध्ध्यन करने लगा।

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जिन विषयों से हमारे अन्तःकरण में स्थित दुष्ट विचारों का नाश हो और सद्विचार पैदा हो तथा मन भगवान में लगने लगे, ऐसे विषय सत्सवरुप परमात्मा के साथ हमारा सम्बन्ध कराने वाले होने से सत् है और उनका संग सत्संग है।

इसलिये जहां तक बन सके देखने- सुनने, चर्चा करने, खाने पीने, पढने लिखने के विषय तथा आजीविका के कार्य, वातावरण और उपासना पद्धति आदि सभी कार्य ऐसे होने चाहिये, जो हमारे चारित्रिक विकास में सहायक हो।


Weekly holy gatherings

जैसे कुसंग से बुद्धि राजसी और तामसी हो जाती है, वैसे ही सत्संग से बुद्धि सात्त्विकी बनती है। सात्त्विकी बुद्धि से व्यक्ति में यथार्थ निर्णय करने की क्षमता बढती है और उसके प्रभाव से मनुष्य अपने वास्तविक कर्त्तव्य को पहचानकर उसपर आरुढ हो जाता है।

मनुष्य की तमसावृत्त बाहरी आंखें सतसंग के प्रकाश से ही खुलती है और सत्संग के बल से ही वह स्वः उत्थान के रास्ते पर आगे बढने का प्रयास कर पाता है। सत्संग के प्रभाव से
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कर्मकाण्ड व गणपति

Posted by cls On August - 30 - 2008

लम्बोदर के प्रमुख चतुर्वर्ण हैं। सर्वत्र पूज्य सिंदूर वर्ण के हैं। इनका स्वरूप व फल सभी प्रकार के शुभ व मंगल भक्तों को प्रदान करने वाला है। नीलवर्ण उच्छिष्ट गणपति का रूप तांत्रिक क्रिया से संबंधित है। शांति और पुष्टि के लिए श्वेत वर्ण गणपति की आराधना करना चाहिए। शत्रु के नाश व विघ्नों को रोकने के लिए हरिद्रागणपति की आराधना की जाती है।
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भगवान दर्शन

Posted by cls On August - 5 - 2008

Radha Krishna

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