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Archive for the ‘Vastu Shastra’ Category


मत्स्य पुराण के अनुसार अनेक दीपकों से लक्ष्मीजी की आरती करने को दीपावली कहते हैं। धन-वैभव और सौभाग्य प्राप्ति के लिए दीपावली की रात्रि को लक्ष्मीपूजन के लिए श्रेष्ठ माना गया है। श्रीमहालक्ष्मी पूजन, मंत्रजाप, पाठ तंत्रादि साधन के लिए प्रदोष, निशीथ, महानिशीथ काल व साधनाकाल अनुष्ठानानुसार अलग-अलग महत्व रखते हैं। पूजा के लिए पूजास्थल तैयार करते समय दिशाओं का भी उचित समन्वय रखना जरूरी है।

पूजा का स्थान ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) की ओर बनाना शुभ है। इस दिशा के स्वामी भगवान शिव हैं, जो ज्ञान एवं विद्या के अधिष्ठाता हैं। पूजास्थल पूर्व या उत्तर दिशा की ओर भी बनाया जा सकता है। पूजास्थल को सफेद या हल्के पीले रंग से रंगें। ये रंग शांति, पवित्रता और आध्यात्मिक प्रगति के प्रतीक हैं। देवी-देवताओं की मूर्तियां तथा चित्र पूर्व-उत्तर दीवार पर इस प्रकार रखें कि उनका मुख दक्षिण या पश्चिम दिशा की तरफ रहे।

पूजा कलश पूर्व दिशा में उत्तरी छोर के समीप रखा जाए तथा हवनकुंड या यज्ञवेदी का स्थान पूजास्थल के आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व दिशा) की ओर रहना चाहिए। लक्ष्मीजी की पूजा के दीपक उत्तर दिशा की ओर रखे जाते हैं। पूजा, साधना आदि के लिए उत्तर या पूर्व या पूर्व-उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना उत्तम है। तंत्रसाधना के लिए पश्चिम दिशा की तरफ मुख रखा जाता है।

दीपावली में दक्षिणवर्ती शंख का विशेष महत्व है। इस शंख को विजय, सुख-समृद्धि व लक्ष्मीजी का साक्षात प्रतीक माना गया है। दक्षिणवर्ती शंख को पूजा में इस प्रकार रखें कि इसकी पूंछ उत्तर-पूर्व दिशा की ओर रहे। श्रीयंत्र लक्ष्मीजी का प्रिय है। इसकी स्थापना उत्तर-पूर्व दिशा में करनी चाहिए।
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वास्तु पुरुष की प्रार्थना पर ब्रह्माजी ने वास्तुशास्त्र के नियमों की रचना की थी। इनकी अनदेखी करने पर उपयोगकर्ता की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक हानि होना निश्चित रहता है। वास्तुदेवता की संतुष्टि गणेशजी की आराधना के बिना अकल्पनीय है।

  1. गणपतिजी का वंदन कर वास्तुदोषों को शांत किए जाने में किसी प्रकार का संदेह नहीं है।
  2. नियमित गणेशजी की आराधना से वास्तु दोष उत्पन्न होने की संभावना बहुत कम होती है।
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वास्तु विज्ञान बच्चों का अध्ययनकक्ष वास्तुसम्मत नियमों के अनुसार बनाने का मुख्य उद्देश्य यह है कि बच्चे तनावरहित व शांत चित्त होकर अध्ययन कर सके और उसकी एकाग्रता में बाधा न पड़े। वास्तु के अनुसार उत्तर या पश्चिम दिशा अध्ययन कक्ष के लिए उत्तम रहती है।

इसका सैद्धांतिक कारण यह है कि उत्तर दिशा का प्रतिनिधि ग्रह बुध है। बुध का संबंध शिक्षा व बुद्धि से माना गया है तथा पश्चिम दिशा का प्रतिनिधि ग्रह शनि है, जिनका संबंध एकाग्रता व गहन अध्ययन से है। कक्ष का प्रवेशद्वार उत्तर अथवा पूर्व की ओर रखा जा सकता है। खिड़की या रोशनदान पूर्व दिशा की ओर रखना चाहिए क्योंकि प्रात:काल यहां से आने वाली सूर्य की किरणों में वातावरण को शुद्ध करने की अद्भुत क्षमता होती है, जिससे नकारात्मक ऊर्जा का शमन होता है।

दक्षिण दिशा में द्वार एवं खिड़कियां नहीं बनानी चाहिए। कक्ष में स्टडी टेबल इस प्रकार रखें कि अध्ययन करते समय बच्चों का मुख पूर्व, उत्तर या ईशान कोण (पूर्व-उत्तर दिशा) की ओर रहे। पुस्तकों की अलमारी वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम दिशा) व नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम दिशा) को छोड़कर अन्यत्र कहीं भी रखी जा सकती है। बच्चों को भी इन दिशाओं की ओर मुख करके अध्ययन नहीं करना चाहिए।

इसका कारण यह है कि वायव्य कोण के स्वामी वायुदेव तथा ग्रह चंद्रमा है, दोनों की प्रकृति चलायमान है। चंद्रमा मन का कारक भी है। अत: इस ओर अध्ययन करने से चित्त में चंचलता आती है और एकाग्रता की कमी रहती है। इसी प्रकार नैऋत्य कोण के स्वामी तथा ग्रह राहु है। यहां अध्ययन करने से बच्चों का पढ़ाई में मन नहीं लगता और वे सिर्फ दिखावे के लिए अध्ययन का ढोंग करते हैं।

ईशान कोण में इष्टदेव, श्रीगणोश तथा मां सरस्वती का चित्र अवश्य लगाएं। गणपति विघ्नहर्ता हैं और मां सरस्वती की उपासना बुद्धि तथा विद्या का विकास करती है। ईशान कोण को सदैव स्वच्छ रखें। कमरे का मध्य स्थान ब्रrा स्थान कहलाता है, इस स्थान पर भी भारी सामान नहीं रखना चाहिए। इस स्थान को खाली रखना उचित है। सोने के लिए बिस्तर दक्षिण-पश्चिम दिशा में रखना चाहिए, सोते समय सिर पूर्व या दक्षिण की ओर हो।

कमरे की दीवारों पर हल्के हरे रंग का पेंट करवाएं क्योंकि हरा रंग बुध का होता है और बुध का संबंध शिक्षा व बुद्धि से है। समय की प्रतीक घड़ी को उत्तर-पूर्व दिशा की तरफ दीवार पर लगाएं। इसके पीछे धारणा यह है कि ग्रहों के राजा सूर्य इसी दिशा में उदय होते हैं अर्थात हर नए दिन की शुरुआत इसी दिशा से होती है। सकारात्मक विचारों की उत्पत्ति व प्रेरणा भी इसी दिशा से प्राप्त होती है।

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वास्तु और दिशायें

Posted by cls On August - 3 - 2008

जहां दोनों दिशाएं मिलती हैं, वह कोण बेहद महत्वपूर्ण होता है , क्योंकि वह दोनों दिशाओं से आने वाली शक्तियों और ऊर्जाओं का मिला देता है।

  • उत्तर और पूर्व के बीच वाले कोण को उत्तर-पूर्व या ईशान कोण कहते हैं।
  • पूर्व और दक्षिण के बीच वाले कोण को दक्षिण-पूर्व या आग्नेय कोण कहते हैं ।
  • दक्षिण और पश्चिम के बीच वाले कोण को दक्षिण-पश्चिम या नैऋत्य कोण कहते हैं।
  • उसी तरह पश्चिम और उत्तर के बीच के कोण को उत्तर-पश्चिम या वायव्य कोण कहा जाता है ।
  • मध्य स्थान को ब्रह्रास्थान के रूप में जाना गया है।



उत्तर

उत्तर दिशा के अधिष्ठित देवता कुबेर हैं जो धन और समृद्धि के द्योतक हैं। ज्योतिष के अनुसार बुद्ध ग्रह उत्तर दिशा के स्वामी हैं। उत्तर दिशा को मातृ स्थान भी कहा गया है। इस दिशा में स्थान खाली रखना या कच्ची भूमि छोड़ना धन और समृद्धि कारक है।

पूर्व

पूर्व दिशा के देवता इंद्र हैं। आत्मा के कारक और रासृष्टि प्रकाश सूर्य पूर्व दिशा से उदय होते हैं। पूर्व दिशा पितृस्थान का द्योतक है। इस दिशा में कोई रूकावट नहीं होनी चाहिए। पूर्व दिशा में खुला स्थान परिवार के मुखिया की लम्बी उम्र का प्रतीक है।

पश्चिम

वरूण पश्चिम दिशा के देवता है और ज्योतिष के अनुसार शनिदेव पश्चिम दिशा के स्वामी हैं। यह दिशा प्रसिद्धि , भाग्य और ख्याति का प्रतीक है।

दक्षिण

यम दक्षिण दिशा के अधिष्ठित देव हैं। दक्षिण दिशा में वास्तु के नियमानुसार निर्माण करने से सुख , सम्पन्नता और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

ईशान कोण

पूर्व और उत्तर दिशाएं जहां पर मिलती हैं उस स्थान को ईशान कोण की संज्ञा दी गई है। यह दो दिशाओं का सर्वोतम मिलन स्थान है। यह स्थान भगवान शिव और जल का स्थान भी माना गया है। ईशान को सदैव स्वच्छ और शुद्ध रखना चाहिए। इस स्थान पर जलीय स्रोतों जैसे कुंआ , बोरिंग वगैरह की व्यवस्था सर्वोतम परिणाम देती है। पूजा स्थान के लिए ईशान कोण को विशेष महत्व दिया जाता है। इस स्थान पर कूड़ा करकट रखना , स्टोर , टॉयलट वगैरह बनाना वर्जित है।

आग्नेय कोण

दक्षिण और पूर्व के मध्य का कोणीय स्थान आग्नेय कोण के नाम से जाना जाता है। नाम से ही साफ हो जाता है कि यह स्थान अग्नि देवता का प्रमुख स्थान है इसलिए रसोई या अग्नि संबंधी (इलैक्ट्रॉनिक उपकरणों आदि) के रखने के लिए विशेष स्थान है। शुक्र ग्रह इस दिशा के स्वामी हैं। आग्नेय का वास्तुसम्मत होना निवासियों के उत्तम स्वास्थ्य के लिए जरूरी है।

नैऋत्य कोण

दक्षिण और पश्चिम दिशा के मध्य के स्थान को नैऋत्य दिशा का नाम दिया गया है। इस दिशा पर निरूति या पूतना का आधिपत्य है। ज्योतिष के अनुसार राहू और केतु इस दिशा के स्वामी हैं। इस क्षेत्र का मुख्य तत्व पृथ्वी है। पृथ्वी तत्व की प्रमुखता के कारण इस स्थान को ऊंचा और भारी रखना चाहिए। इस दिशा में गड्ढे , बोरिंग , कुंए इत्यादि नहीं होने चाहिए।

वायव्य कोण

उत्तर और पश्चिम दिशा के मध्य के कोणीय स्थान को वायव्य दिशा का नाम दिया गया है। इस दिशा का मुख्य तत्व वायु है। इस स्थान का प्रभाव पड़ोसियों , मित्रों और संबंधियों से अच्छे या बुरे संबंधों का कारण बनता है। वास्तु के सही उपयोग से इसे सदोपयोगी बनाया जा सकता है।

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आज के भौतिक संसार में मनुष्य अध्यात्म को छोड़कर भौतिक सुखों के पीछे भाग रहा है। समय के अभाव ने उसे रिश्तों के प्रति उदासीन बना दिया है। परन्तु आज भी मनुष्य अपने घर में संसार के सारे सुखों को भोगना चाहता है। इसके लिए वैवाहिक जीवन को वास्तु से जोड़ना होगा। वास्तव में हम ऐसा क्या करें कि पति-पत्नी के बीच अहंकार की जगह प्रेम, प्रतियोगिता के स्थान पर सानिध्य मिले
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