Archive for the ‘Vastu Shastra’ Category

लक्ष्मी पूजा का स्थान ईशान कोण में हो

मत्स्य पुराण के अनुसार अनेक दीपकों से लक्ष्मीजी की आरती करने को दीपावली कहते हैं। धन-वैभव और सौभाग्य प्राप्ति के लिए दीपावली की रात्रि को लक्ष्मीपूजन के लिए श्रेष्ठ माना गया है। श्रीमहालक्ष्मी पूजन, मंत्रजाप, पाठ तंत्रादि साधन के लिए प्रदोष, निशीथ, महानिशीथ काल व साधनाकाल अनुष्ठानानुसार अलग-अलग महत्व रखते हैं। पूजा के लिए पूजास्थल [...]

विघ्नहर्ता – वास्तुदोष निवारक

वास्तु पुरुष की प्रार्थना पर ब्रह्माजी ने वास्तुशास्त्र के नियमों की रचना की थी। इनकी अनदेखी करने पर उपयोगकर्ता की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक हानि होना निश्चित रहता है। वास्तुदेवता की संतुष्टि गणेशजी की आराधना के बिना अकल्पनीय है। गणपतिजी का वंदन कर वास्तुदोषों को शांत किए जाने में किसी प्रकार का संदेह नहीं है। नियमित [...]

अध्ययनकक्ष और वास्तु

वास्तु विज्ञान बच्चों का अध्ययनकक्ष वास्तुसम्मत नियमों के अनुसार बनाने का मुख्य उद्देश्य यह है कि बच्चे तनावरहित व शांत चित्त होकर अध्ययन कर सके और उसकी एकाग्रता में बाधा न पड़े। वास्तु के अनुसार उत्तर या पश्चिम दिशा अध्ययन कक्ष के लिए उत्तम रहती है। इसका सैद्धांतिक कारण यह है कि उत्तर दिशा का [...]

वास्तु और दिशायें

जहां दोनों दिशाएं मिलती हैं, वह कोण बेहद महत्वपूर्ण होता है , क्योंकि वह दोनों दिशाओं से आने वाली शक्तियों और ऊर्जाओं का मिला देता है। उत्तर और पूर्व के बीच वाले कोण को उत्तर-पूर्व या ईशान कोण कहते हैं। पूर्व और दक्षिण के बीच वाले कोण को दक्षिण-पूर्व या आग्नेय कोण कहते हैं । [...]

दाम्पत्य सुख और वास्तु

आज के भौतिक संसार में मनुष्य अध्यात्म को छोड़कर भौतिक सुखों के पीछे भाग रहा है। समय के अभाव ने उसे रिश्तों के प्रति उदासीन बना दिया है। परन्तु आज भी मनुष्य अपने घर में संसार के सारे सुखों को भोगना चाहता है। इसके लिए वैवाहिक जीवन को वास्तु से जोड़ना होगा। वास्तव में हम [...]

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