फिल्म : निराशाजनक
निर्माता: सृष्टि आर्य
निर्देशक: गोल्डी बहल
कलाकार: अभिषेक बच्चन, प्रियंका चोपड़ा, के के मेनन, जया बच्चन, अखिलेंद्र मिश्रा, मास्टर वीर आर्य
‘द्रोण’ में है -बड़े सितारे, बड़ी पृष्ठभूमि, बड़ा खर्च, विज्ञापनों के लिए बड़ा बजट, बड़ी उम्मीदें, इन सबके बावजूद दर्शकों को लुभाने में असफल हो रही है।
फंतासी कहानियां हिंदी फिल्म जगत में बहुत कम दिखाई देती हैं, इसलिए इस फिल्म के लिए गोल्डी बहल की हिम्मत की सराहना तो करनी पड़ेगी। फिल्म की विफलता का सबसे बड़ा कारण है इसकी पटकथा। पटकथा के तीन लेखकों जयदीप सरकार, रोहिणी किल्लौघ और गोल्डी बहल को सबसे ढीली-ढाली पटकथा के लिए पुरस्कार मिलना चाहिए।
जितनी मेहनत फिल्म के निर्माता इरोस के लुल्ला और सृष्टि आर्य ने ‘द्रोण’ के प्रचार के लिए की है, उतनी सफलता नहीं मिल पा रही है।
गोल्डी बहल और इसके लेखक शायद खुद ही नहीं निर्णय ले पाए कि ‘द्रोण’ एक सुपरहीरो फिल्म है या फंतासी। वैसे तो इसके निर्माता कहते रहें हैं कि यह एक सुपरहीरो फिल्म नहीं है, लेकिन फिल्म के नायक की सभी हरकतें सुपर हीरो की तरह हैं। इसके बावजूद फिल्म का नायक तभी शक्तिशाली लगता है जब खलनायक उतना ही खुंखार हो। लेकिन इस फिल्म का खलनायक (के के मेनन) काफी मजाकियां लगते है। फिल्म के गाने और दो घंटे से कुछ ज्यादा की लंबाई भी उबाऊ लगने लगती हैं।
नन्हा आदित्य को एक परिवार पालता है, जहां उसे हमेशा तानों और बेइज्जती का सामना करना पड़ता है। आदित्य (अभिषेक बच्चन) बड़ा होता है। तब आता है एक बुरा जादूगर रिज रायजादा (के के मेनन) जो असुरों का वंशज है। वह एक बहुमूल्य राज ‘अमृत’ को पाने के लिए तड़पता है। ‘अमृत’ तक पहुंचने के लिए उसे ‘द्रोण’ से लड़ना होगा। लेकिन समस्या यह है कि उसे पता ही नहीं कि ‘द्रोण’ कौन है।
एक दिन अचानक रिज और द्रोण की मुलाकात होती है और द्रोण की कलाई के कड़े से वह उसे पहचान जाता है। वह अपने आदमियों को द्रोण को मारने के लिए भेजता है, लेकिन द्रोण को बचाती है सोनिया (प्रियंका चोपड़ा) जो बाद में उसे उसकी असली पहचान से सामना करवाती है।
सोनिया उसे जन्मस्थान ले जाकर द्रोण को उसकी मां जयती देवी (जया बच्चन) से मिलवाती है। द्रोण को अपनी जड़ों का पता चलता है और रिज उसका पीछा करते-करते वहां पहुंच जाता है। यहीं से द्रोण का सफर शुरू होता है।
पटकथा के कमजोर होने के बावजूद गोल्डी बहल ने दो दृश्य बहुत अच्छे से निर्देशित किए हैं। एक तो जब के के मेनन जया बच्चन को बुत बना देता है और दूसरा रेलगाड़ी के दृश्य।
द्रोण में इस्तेमाल की गई वी एफएक्स तलनीक सराहनीय हैं। समीर आर्य का छायांकन थोडा कमजोर है। रोशनी भी कुछ जगह पर काफी कम है।
जया बच्चन की शोभा उठकर आती है लेकिन उनकी भूमिका छोटी है। अभिषेक का काम सराहनीय है। प्रियंका का परिचय काफी अच्छा दिखाया गया है। के के मेनन दर्शकों को प्रभावित करने में असफल रहे है ।
कुल मिलाकर ‘द्रोण’ आपको नहीं लुभाती और केवल निराश करती हैं।
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