फैशन इंडस्ट्री
फैशन इंडस्ट्री के बूम से आज कौन परिचित नहीं है। इसमें शोहरत है, ग्लैमर है और है भरपूर पैसा। रोजगार के लिहाज से आज फैशन इंडस्टी् का फलक बहुत ही व्यापक हो चुका है और इसमें हर प्रकार के पेशेवर को खास विशेषज्ञता के साथ ही प्रवेश मिल पाता है। रोजगार के लिहाज से फैशन इंडस्ट्री के व्यापक क्षेत्र पर एक नजर
फैशन इंडस्ट्री रोमांचक दौर से गुजर रही है। यदि आप डिजाइनिंग, बायर, प्रोडक्शन मैनेजर, फैशन कम्युनिकेटर, ब्रांड प्रमोटर, एक्सपोर्टर, फैशन रिटेलर, फैशन मॉडल, फैशन एडवर्टाइजर या फिर फैशन व्यवसाय के किसी अन्य पक्ष से जुडे हैं, तो यकीनन आज का समय आपके करियर को आसमान की ऊंचाइयों पर पहुंचा देगा। जोश और जज्बे से भरी फैशन की दुनिया में रातों-रात सारे समीकरण बदल जाते हैं परिवर्तन की इस हवा को हर तरफ देखा और महसूस किया जा सकता है यानी मैटिरियल, एम्बेलिशमेंट, प्रोडक्शन और मार्केटिंग रणनीतियों तक में परिवर्तन साफ दिख रहा है।

फैशन इंडस्ट्री के क्षेत्र में आज अलग-अलग पेशेवरों या प्रोफेशनल्स की मांग है। सबसे पहले डिजाइन क्षेत्र को लें। आज के समय में डिजाइनर का काम काफी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि उसे बाजार की मांग के मुताबिक किसी खास प्रोडक्ट, सीजन और प्राइस प्वाइंट को ध्यान में रखकर काम करना होता है। डिजाइनर अपनी क्रिएटिविटी को अपने डिजाइनों के मार्फत प्रदर्शित करने के लिए आजाद नहीं है। उसे ग्राहक के निर्देशों, उसकी मांग या अपेक्षाओं को ध्यान में रखकर ही काम करना होता है। मार्केट की असल जरूरतों को समझने और यह तय करने कि क्या बिक सकता है, क्या नहीं, के बाद ही वह स्टाइल, कलर, एम्बेलिशमेंट आदि चुनकर समय पर परिधान तैयार करता है। इस हिसाब से यह एक चुनौतीभरा और लीक से हटा प्रोफेशन है। कारीगरों, फैब्रिक सप्लायर के साथ मिलकर काम करना, रंगों और तकनीशियनों का चुनाव करना और इन सबके सहारे जादुई प्रभाव बुनना बच्चों का खेल नहीं है। यानी यह दूसरे क्षेत्रों के रूटीन जॉब से एकदम फर्क है।
इसमें एकदम परफैक्ट काम करने का दबाव तो रहता है लेकिन पूरे काम के दौरान रोमांच भी बना रहता है। ग्राहकों और खरीदारों की तमाम किस्म की मांगों को पूरा करने के बाद जब बाजार में आपका प्रोडक्ट स्वीकार कर लिया जाता है या कोई साख वाला ब्रांड उसे खरीदता है या फिर मार्केट में उसकी बिक्री होने लगती है तो जो संतुष्टि मिलती है उसका कोई मुकाबला नहीं है। जबर्दस्त प्रतिस्पर्धा, अनपेक्षित परिवर्तन और तेजी से बदलता माहौल ही किसी भी डिजाइनर के प्रोफाइल का हिस्सा है।
डिजाइनर के रूप में आप किसी एक्सपोर्ट हाउस के लिए काम कर सकते हैं या फिर रिटेल हाउस या फिर मीडिया में कॉस्ट्यूम डिजाइनर बन सकते हैं। आपका अपना लेबल है, तो भी इनकी चुनौतियों को कम नहीं आंका जा सकता। रंगों, टैक्स्चर, फॉर्म्स, स्टाइल्स और क्रिएटिविटी के अंतहीन सिलसिले में रचे-बसे डिजाइनर को जो रचनात्मक संतुष्टि मिलती है, वह बयान से परे है।
प्रोडक्शन
बेशक, डिजाइनर ही मार्केट को ध्यान में रखकर नए प्रोडक्ट बनाता है और उसके मुताबिक रणनीति तय करता है, लेकिन वह प्रोडक्शन टीम ही होती है जो इन सब तैयारियों को साकार कर बाजार की मांग को ध्यान में रखकर उत्पादों को ठोस रूप देती है। जरा ऐसे बड़े ऑर्डर की कल्पना कीजिए जिसके चलते अलग-अलग किस्म के डिजाइनों और फरमाइशों, मैटीरियल, फिनिश तथा ट्रिम आदि के अनुरूप शर्ट, बॉटम वगैरह तैयार करने हैं और इस पूरे ऑर्डर को एक निश्चित समयावधि के अंदर पूरा भी करना है, साथ ही कलर, स्टाइल, साइज, पैकेजिंग, शिपिंग आदि से संबंधित निर्देशों का भी पूरा-पूरा पालन करना है। यानी प्रोडक्शन मैनेजर को एक कुशल प्लानर, ऑर्गेनाइजर, कम्युनिकेटर, टास्क-मास्टर और टेक्नोलॉजिस्ट भी बनना पड़ता है। उसे ऑर्डर के हिसाब से अपनी इन-हाउस प्रोडक्शन क्षमता का मेल बैठाना होता है और भरोसेमंद विक्रेताओं को आउटसोर्स भी करना होता है। एक प्रोडक्शन मैनेजर के लिए मशीन-मनुष्य अनुपात के जटिल संतुलन के अलावा प्रोडक्शन लाइनों की समझ और संसाधनों का भरपूर इस्तेमाल करना, कम से कम बर्बादी तथा उत्पादकता का ऊंचा स्तर बनाए रखना यकीनन काफी चुनौतीपूर्ण होता है। इसी तरह प्रोडक्शन मैनेजर को कटाई, सिलाई, फिनिशिंग और पैकिंग में क्वालिटी के साथ-साथ एक्यूरेसी का भी ख्याल रखना होता है। सच्चाई यह है कि प्रोडक्शन मैनेजर ही किसी मैन्यूफैक्चरिंग इकाई के आधार को गति देता है। उसे न सिर्फ मैटिरियल और मशीन के साथ जूझना पड़ता है बल्कि लोगों के साथ भी बड़ी चतुराई से पेश आना होता है। यानी इस क्षेत्र में चुनौतियों और रोमांच की कोई कमी नहीं।
मार्केटिंग
ग्लैमर ने आज फैशन उघोग की तस्वीर बदल डाली है और इसकी वजह से जहां एक आ॓र एकरसता टूटी है वहीं इसने एंड कंज्यूमर सैगमेंट पर मर्केंडाइजिंग और रिटेल ऑप्शन्स के मामले में उत्साह पैदा किया है। इस क्षेत्र से जुड़े प्रोफेशनल्स इसी जटिल कारोबार का हिस्सा हैं।
निर्यातक और निर्माता हैं तो पूरा का पूरा जोखिम आप पर होता है क्योंकि पैसा तभी मिलता है जब ऑर्डर किया गया माल पूरी तरह से मांग पर खरा उतरता है। यानी खरीदार की शर्तों पर खरा उतरने के बाद और समय पर डिलीवरी जैसी शर्तों का पालन सुनिश्चित करने के बाद ही पैसा मिलता है। ऐसें में कहीं भी चूक हो जाए तो निर्माता को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। ऑर्डर बुकिंग से लेकर डिलीवरी और फिर पैसे की वसूली तक पूरी प्रक्रिया में शुरू में लैटर ऑफ क्रेडिट जारी होता है और मर्केडाइजर द्वारा माल की सप्लाई के बाद जाकर यह काम पूरा माना जाता है।
यह काफी प्रमुख भूमिका होती है जिसमें सप्लाई चेन के सभी पक्षों के साथ पूरा तालमेल रखना होता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कहीं कोई गड़बड़ न हो और बिना किसी कमी के ऑर्डर पूरा हो सके। एक मर्केंडाइजर को किसी एक खरीदार या ग्राहक या मार्केट या फिर प्रोडक्ट अथवा स्टाइल या प्राइस प्वाइंट पर ही नहीं जूझना पड़ता बल्कि सच तो यह है कि वह अलग-अलग देशों/बाजारों के कई कई खरीदारों के साथ मिलकर काम करता है। उसके पास प्रोडक्शन की जानकारी के अलावा टैक्नोलॉजी, मैटिरियल, डिजाइन, मैन्यूफैक्चरिंग टैक्नोलॉजी, बिजनेस एथिक्स और कॉस्टिंग प्राइसिंग की समझ होती है।
मर्केंडाइजर ही फैब्रिक की व्यवस्था करने से लेकर विक्रेताओं को आउटसोर्सिंग करने, मोल-भाव करने, ऑर्डर तथा प्रोडक्शन यूनिटों के सभी पहलुओं का आपस में तालमेल बिठाने से लेकर खरीदारों, अधिकारियों, लॉजिस्टिक्स प्रबंधन जैसे विभिन्न स्तरों पर समन्वय करता है। रूझानों के पूर्वानुमानों पर आधारित जटिल बिजनेस प्लान पर काम कर उसे मुनाफा दिलाने वाले कारोबार में बदलना ही इस पेशे की मूल योग्यता होती है और यहीं पर मर्केंडाइजिंग की पूरी ताकत दिखायी देती है। मर्केंडाइजर को अपने रोजमर्रा के काम में बहुत चुनौतियों से जूझना पड़ता है। बेशक, उसका काम जटिल होता है इसीलिए उसी के मुताबिक उसका वेतन और अन्य लाभ भी होते हैं और इस क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ने के कई मौके भी मिलते हैं।
फैशन रिटेल
फैशन उघोग में वर्तमान में रिटेलिंग का खूब जोर है। फैशन स्ट्रीट पर प्रदर्शित परिधानों को देखकर आपको लगेगा जैसे डिस्प्ले ही आपको हैरान करने के लिए काफी है। किसी ग्राहक को डिस्प्ले के जरिए लुभाने और शो रूम में आकर तत्काल खरीदारी के लिए प्रेरित करने का काम विजुअल मर्केंडाइजर का होता है। यह काम सुनने में आसान लग सकता है लेकिन है काफी मुश्किल, क्योंकि संभावित खरीदारों को दुकान में आने के लिए प्रेरित करना और फिर उसे ऐसा दिलचस्प अनुभव कराना कि वह खरीदारी के लिए उत्सुक हो सके, सचमुच किसी चुनौती से कम नहीं। दुकान में जितने लोग आते हैं उन्हें खरीदार बनाना काउंटर के पीछे तैनात सेल्सकर्मी का काम होता है। आमतौर पर आप जो सेल्सपर्सन देखते हैं, उनसे अलग फैशन रिटेल सेल्समैन प्रशिक्षण पाए पेशेवर होते हैं जो एक खास ‘क्लास’ के ग्राहकों की जरूरतों को पूरा करते हैं। फैशन प्रोडक्ट्स हर तरह के ग्राहक वर्ग की जरूरतों को पूरा करते हैं। अत्यधिक मूल्य वर्धन से लेकर लगातार बदलते डिजाइनों के चलते मुनाफा प्रभावित होता है। लिहाजा, पहले से ही समुचित प्लानिंग करना और कुशल प्रबंधन करना कामयाबी की कुंजी होता है।
फैशन की दुनिया को इतनी गति और ऊर्जा सिर्फ मर्केंडाइजरों से ही नहीं मिलती बल्कि चुपचाप बैक एंड पर काम करने वाली उन पेशेवरों की टीम से भी मिलती है जो ग्राहकों की मांग, पसंद, अपेक्षाओं, नए रूझानों, स्टाइल, डेमोग्राफिक अध्ययन, प्रोडक्ट सोर्सिंग/डेवलपमेंट, प्राइसिंग तथा दूसरी कई बातों को ध्यान में रखकर योजनाएं बनाती है। बाजार की पूरी पड़ताल, अलग अलग वर्गों की जानकारी, रूझानों को भांपने की क्षमता आदि की बदौलत इस काम को पूरा किया जाता है।
कस्टमर के लिए तरह-तरह के मर्केंडाइजर पेश करना जरूरी होता है। स्मार्ट फैशन रिटेल मर्केंडाइजर वही होता है जो ग्राहकों की फरमाइश को ध्यान में रखकर बाजार के लिए पेशकश करता है। यह उघोग है रिस्क लेने वालों का, कुछ अलग हटकर सोचने वालों और आविष्कारी ख्यालात रखने वालों का।
अब वो दिन लद चुके हैं जब खरीदारी का पूरा जिम्मा सिर्फ सेल्समैन संभालता था। फैशन रिटेल के दायरे में आज बहुत से चुनौतीपूर्ण और रोमांचक पक्ष शामिल हो चुके हैं। अब यह सिर्फ सेल्समैनशिप नहीं रह गया है। इस क्षेत्र में क”रियर की ढेरों संभावनाएं हैं और क्रिएटिव प्रोडक्ट डिजाइनों से लेकर स्पेशलाइज्ड मार्केटिंग प्रोफेशन्लस, कल्पनाशील मर्केंडाइजर्स, होशियार बैक ऑफिस मैनेजर, समर्पित कस्टमर केयर एग्जीक्युटिव, दूरद्रष्ट्रा उघमी, ग्राहकों को प्रभावित करने वाले सेल्समैन वगैरह इस पूरे पेशे का आधार हैं।
अब फैशन व्यवसाय के लिए प्रशिक्षित कर्मियों को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। आने वाले समय में विकास की जबर्दस्त संभावनाओं के मद्देनजर ऐसा होना स्वाभाविक है। अब यह उघोग पर निर्भर करता है कि वह फाइबर से लेकर रिटेल तक के समीकरणों को बखूबी समझे ताकि हम प्रशिक्षित कर्मियों के मामले में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पिछड़ न जाएं।
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