ऑनलाइन पढ़ें और आगे बढ़ें
हमारे देश में सरस्वती जैसे लाखों किशोर व युवा हैं, जो महानगरों के स्कूल-कॉलेजों में पढाई करने का ख्वाब देखते हैं। लेकिन संसाधनों की कमी के कारण उनका यह सपना हकीकत में कम ही बदल पाता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए उच्चस्तरीय कॉलेजों की पढाई को ग्रामीण लोगों के द्वार तक पहुंचाने के लिए यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (यूजीसी) ने ई-यूनिवर्सिटी की स्थापना की है। ई-यूनिवर्सिटी अपने सैटेलाइट एडुसेट के जरिए उच्चस्तरीय शिक्षा को एक क्लिक पर कम्प्यूटर या टेलीविजन के माध्यम से दूर-दराज के लोगों तक पहुंचा रही है

क्या है ई-यूनिवर्सिटी?
अभी भी गांवों में रहने वाले युवाओं को कॉलेज की पढाई के लिए या तो मीलों चलकर कस्बे के महाविद्यालय में जाना होता है या फिर पढाई करने के लिए अपने घर-परिवार से दूर शहर में जाना पडता है। इसके लिए उनके रास्ते में अन्य तमाम मुसीबतें भी आती हैं। इसलिए यूजीसी ने एक योजना के तहत एक ऐसी यूनिवर्सिटी का गठन किया है, जिसमें न तो परंपरागत कॉलेज की तरह किसी बडे आधारभूत ढांचे की जरूरत है और न ही लाखों-करोडों रुपये खर्च करने की! बेहद कम खर्च में देश के दूर-दराज इलाकों में रहने वाले विद्यार्थी घर बैठे देश के ख्याति प्राप्त विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर्स के लेक्चर्स का लाभ उठा सकेंगे।

कैसे होगी पढाई
दरअसल, यूजीसी की योजना के मुताबिक आने वाले दिनों में ई-यूनिवर्सिटी में सैटेलाइट के जरिए कॉलेज की पढाई उपलब्ध करवाई जाएगी। इससे स्टूडेंट्स को पढाई के लिए कहीं दूर नहीं जाना पडेगा, बल्कि वे अपने घरों में बैठकर ही टेलीविजन और इंटरनेट के जरिए पढाई पूरी कर लेंगे। वे जब चाहें, तब एक निश्चित वेब पेज खोलकर अपने विषय का अध्ययन कर सकते हैं। ई-लर्निग में अलग-अलग विषयों की हार्ड कॉपी को सॉफ्ट कॉपी (ई-कॉपी) में बदला जाता है। कहने का मतलब यह है कि आप अपने वेब पेज को खोलकर अपने मनचाहे विषय के ऑप्शन पर क्लिक कर उसे पढ सकते हैं। इसमें स्टूडेंट्स को कठिन लगने वाले सवालों के कई ऑप्शन मौजूद रहते हैं, जिसे क्लिक कर वह अपनी समस्याओं का समाधान कर सकता है। इसमें ऑनलाइन एग्जाम्स की भी व्यवस्था होती है।

टेक्निक का कमाल है ई-यूनिवर्सिटी
ई-यूनिवर्सिटी के तहत दिल्ली स्थित मेन स्टडी सेंटर सहित कुल 17 इलेक्ट्रिनिक मल्टी मीडिया रिसर्च सेंटर्स (ईएमएमआरसी) हैं, जहां सैटेलाइट के जरिए क्लासेज की व्यवस्था की गई है। इसके अन्य सेंटर्स जिन शहरों में स्थित हैं, उनके नाम हैं- अहमदाबाद, कोलकाता, हैदराबाद(ईएफएलयू),हैदराबाद (उस्मानिया यूनिवर्सिटी), जोधपुर, मदुरै, पुणे, कालीकट, चेन्नई, इम्फाल, इंदौर, मैसूर, पटियाला, रुडकी, सागर, श्रीनगर आदि। यूजीसी का अपना सैटेलाइट लिंक (एडुसेट) भी है, जो दिल्ली और अन्य सेंटर्स को आपस में जोडता है। इसी की सहायता से स्टडी प्रोग्राम का प्रसारण होता है। यदि एक पंचायत के पास डीटीएच (डायरेक्ट टू होम) का एंटीना है, तो उस पंचायत के सभी गांव के छात्र-छात्राएं टेलीविजन की सहायता से पढाई कर पाएंगे। यदि वहां इंटरनेट की सुविधा भी उपलब्ध हो, तो यह उनके लिए और भी लाभप्रद होगा। इससे संबंधित अधिक जानकारी के लिए आप इस पते पर सम्पर्क कर सकते हैं : कन्सोर्टियम फॉर एजुकेशनल कम्युनिकेशन, एनएससी कैम्पस, अरुणा आसफ अली मार्ग नई दिल्ली (फोन : 011-2897418, 26897419, ई-मेल : cecugc @cec-ugc.org)
करियर की भी खुली नई राह
ई-यूनिवर्सिटी के इस काम को आसान बनाने के लिए बडी संख्या में प्रशिक्षित लोगों की जरूरत होगी। अलग-अलग विषयों की हार्ड कॉपी को ई-कन्टेंट में बदलना, टेक्स्ट का कम्पाइलेशन, भिन्न-भिन्न सॉफ्टवेयर्स का सेटअप, नॉन-लीनियर एडिटिंग, कैमरा हैंडलिंग आदि अनेक कार्य हैं, जिसके लिए ट्रेंड लोगों की दरकार होगी है। साइंस, टेक्नोलॉजी और एकेडमिक्स के एक्सपर्ट्स इस क्षेत्र में समुचित काम पा सकते हैं।
कौन-कौन से हैं काम?
ई-कन्टेंट (स्टडी मैटीरियल) को तैयार करने के लिए कार्यो को दो भागों में बांटा गया है-कन्टेंट डेवलॅपमेंट और प्रोग्राम डेवलॅपमेंट। ई-यूनिवर्सिटी के सभी कार्य इन्हीं दो भागों के इर्द-गिर्द घूमते हैं। इसमें जो प्रमुख पद होंगे, उनके नाम इस प्रकार हैं : ई-कन्टेंट डेवलॅपर, कोर्स कोऑर्डिनेटर, प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर, पे्रजेंटर, रिसोर्स पर्सन, स्टूडियो इन चार्ज, नॉन-लीनियर एडिटर, मल्टीमीडिया प्रोग्रामर, कैमरामैन, डेटा एंट्री ऑपरेटर आदि।
आरंभिक कमाई
यदि आप अच्छे एकेडमिक रिजल्ट के साथ-साथ टेक्निकल स्किल में भी महारत रखते हैं, तो फिर आपको इस फील्ड में आकर्षक वेतनमान मिल सकता है। यहां सैलरी की शुरुआत 12-15 हजार रुपये से होती है। इसकेअलावा, ऊंचे पदों पर 40-50 हजार रुपये तक मिल सकते हैं।
स्टूडेंट्स के लिए बेहतर विकल्प
भारत में 4 करोड 20 लाख बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। यदि उन बच्चों को स्कूल और कॉलेजों में डाला जाए, तो दस लाख अतिरिक्त क्लास रूम, उतनी ही संख्या में टीचर, यूनिवर्सिटी प्रोफेसर, लेक्चरर आदि की जरूरत पडेगी। साथ ही, इन्फ्रास्ट्रक्चर पर भी अरबों रुपये खर्च करने पडेंगे। ऐसी स्थिति में भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश के लिए ई-यूनिवर्सिटी एक बेहतर विकल्प है। अमेरिका और ग्रेट-ब्रिटेन आदि जैसे देशों में ई-यूनिवर्सिटी सफलतापूर्वक चलाई जा रही है।
समय की मांग है ई-लर्निग
ई-यूनिवर्सिटी की शुरुआत कैसे हुई?
यूजीसी 15 अगस्त, 1984 से दूरदर्शन के माध्यम से देश भर में एजुकेशनल टीवी प्रोग्राम प्रसारित कर रहा है। इससे छोटे शहरों, कस्बों, गांवों आदि में रहकर पढाई कर रहे युवा लाभान्वित होते रहे हैं। भारत को नॉलेज सुपर पॉवर बनाने के लिए दूर-दराज के इलाकों को कॉलेज शिक्षा से जोडना अत्यंत आवश्यक है। इस लक्ष्य को पूरा करने में सहयोग दिया है टेलीविजन और इंटरनेट की दुनिया ने। इसी का परिणाम आज ई-यूनिवर्सिटी के रूप में सबके सामने है। इससे गांव-देहात के लोग घर बैठे कॉलेज के एक्सपर्ट्स के व्याख्यान को देख और सुन सकेंगे। वे चाहें, तो उनसे ऑनलाइन प्रश्न भी पूछ सकते हैं।
क्या ग्रामीण पृष्ठभूमि के युवाओं को इसका लाभ उठाने के लिए अधिक पैसा खर्च करना होगा?
नहीं, इससे लाभ पाने के लिए बहुत कम पैसा खर्च करना होगा। इसके लिए प्रत्येक पंचायत के पास एक डीटीएच एंटीना, अधिक पॉवर वाला जेनरेटर और इंटरनेट की सुविधा होनी चाहिए।
ई-लर्निग के माध्यम से कौन-कौन से कोर्स संचालित किए जाते हैं?
शुरुआत में हमारे यहां डिप्लोमा एवं सर्टिफिकेट कोर्स की व्यवस्था की गई है। इन कोर्सो के तहत आप एडिटिंग, मार्केटिंग, लाइब्रेरी मैनेजमेंट आदि का डिप्लोमा कोर्स कर सकते हैं। हालांकि, आने वाले समय में आप ग्रेजुएट तथा पोस्ट ग्रेजुएट की डिग्री ई-यूनिवर्सिटी के जरिए ले सकते हैं।
कैसे पढाएंगे विशेषज्ञ?
दरअसल, मुख्य सेंटर्स पर विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों को लेक्चर्स के लिए हायर करते हैं। कई विशेषज्ञ हमारे यहां पार्ट-टाइम भी काम कर रहे हैं। यदि किसी विषय का व्याख्याता हैदराबाद का है, तो हम वहीं उनका क्लास रिकॉर्ड कर सभी सेंटर्स पर टेलीकास्ट करवा देते हैं।
छोटे शहरों के लिए क्या योजना है?
आने वाले दिनों में छोटे शहरों में भी स्टडी सेंटर्स खोले जाएंगे। इससे छात्रों को भाषाई समस्या का सामना नहीं करना पडेगा। उदाहरण के लिए यदि कोई मलयाली भाषा में अपने कोर्स मैटीरियल को समझना चाहता है, तो स्टडी सेंटर पर उसी भाषा के जानकार से संबंधित विषय पर व्याख्यान दिलवाया जाएगा। इससे रीजनल भाषा का ज्ञान रखने वाले छात्रों को भी लाभ हो सकेगा।
क्या इसके लिए लेक्चरर को कोई विशेष ट्रेनिंग भी दी जाएगी?
कई बार ऐसा होता है कि अपने विषयों में पारंगत होने के बावजूद लोग कैमरा फ्रेंडली नहीं होते हैं। उन्हें कक्षा में बिना स्टूडेंट के लेक्चर देने में असुविधा होती है। इसलिए टेक्निकल ट्रेनिंग के साथ-साथ उन्हें कैमरा फ्रेंडली होने का प्रशिक्षण दिया जाएगा।
___________________________________________________
ऑनलाइन पढ़ें और आगे बढ़ें
Popularity: 10% [?]
i wants to read a notes of machenical workshop notes
machnical