होली परस्पर सौहार्द, भाईचारे और मेल-मिलाप का मस्ती-भरा त्यौहार है। हर वर्ष होली के अवसर पर लोग प्रेम, त्याग और आपसी मोहब्बत का इजहार करते हुए एक दूसरे को अबीर-गुलाल लगाते हैं, रंग-बिरंगे रंगों से एक-दूसरे को सरोबार कर देते हैं। दरअसल होली और रंगों को अलग करके नहीं देखा जा सकता। रंग, गुलाल, अबीर के बिना होली की कल्पना ही अधूरी लगती है। लेकिन गलत रंगों का प्रयोग कितनी हानि पहुंचा सकता है, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। आज जब कभी अपने मित्र रवि को देखता हूं तो मुझे उसके चेहरे के काले धब्बों में होली के हानिकारक रंगों की प्रतिछाया नजर आती है। आज से दो साल पूर्व होली के दिन की बात है रवि अपने दोस्तों के साथ पूरे जोश और उत्साह से होली खेल रहा था कि अचानक रवि चीख पड़ा।
वह दोनों हाथों से मुंह छिपाए बुरी तरह छटपटा रहा था। दरअसल किसी ने उसके चेहरे पर तेजाब मिला रंग मल दिया था। रवि को तुरंत डाक्टर के पास ले जाया गया। काफी उपचार के बाद रवि के चेहरे के घाव ठीक हो सके। लेकिन चेहरे पर जगह-जगह हमेशा के लिए काले धब्बे बने रह गए। जो कुछ रवि के साथ हुआ, वैसा ही या उससे मिलता-जुलती घटनाएं अक्सर हर होली पर घटती रहती हैं। दरअसल भाईचारे के इस त्यौहार को कुछ लोग महज आनंद लेने के लिए ऐसे खतरनाक रंगों का इस्तेमाल करते हैं या अन्य अशोभनीय हरकतें करते हैं। लेकिन वह नहीं जानते कि उनके क्षणिक आनंद की यह सौगात किसी व्यक्ति के लिए कितनी घातक सिद्घ हो सकती है। होली के ही दिन एक परिचित को लिवाने स्टेशन जाना पड़ा। स्टेशन पर सभी और होली के हुड़दंगी दिखाई दे रहे थे। जैसे ही ट्रेन स्टेशन पर आई, कराहने की कुछ आवाजें मेरे कानों में पड़ी। पता करने पर मालूम हुआ कि चलती ट्रेन पर जगह-जगह हुड़दंगियों द्वारा पथराव किया गया। इस पथराव से एक सज्जन के सिर पर गहरी चोटें आई थी और सिर से खून रिस रहा था। एक अन्य यात्री आनी आंख की रोशनी लगभग खो ही बेठा था क्योंकि वह खिड़ेकी के पास बैठा था और पत्थर लगने से खिड़की का शीशा फूटकर सीधा उसकी आँख में जा घुसा था। दूसरे कुछ यात्री भी इसी तरह पथराव के शिकार हुए थे। मैं किसी तरह अपनी खैरियत मनाता हुआ परिचित को लेकर घर आ गया। लेकिन मन कई दिनों तक इस घटना को लेकर उद्विग्र रहा। आखिर क्षणिक मनोरंजन के लिए यह सब करने से लोगों को क्या हासिल होता है?
पहले प्राकृ तिक रंगों से होली खेली जाती थी। फूलों और पेड़ों से प्राप्त रंगों से ही एक दूसरे को रंगा जाता था। ये रंग शरीर और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं थे, किंतु व्यावसायिकता और कृत्रिमता के इस युग में रंग भी कृ त्रिम हो गए। आज जो रंग तैयार किए जाते हैं, वह रासायनिक विधि से बने होते हैं। कई प्रकार के यौगिक और रसायनों को मिश्रण कर कृत्रिम रंगों का निर्माण किया जाता है। ये रंग त्वचा को क्षति पहुंचाते हैं। होली के अवसर पर रंग खेलते समय सावधानी रखना अत्यंत आवश्यक है। गुलाल और अबीर लगवाते समय या लगाते समय आंख बंद कर लेनी चाहिए क्योंकि इनमें मौजूद पोटेशियम हाईक्रोमेट नामक हानिकारक तत्व आंखों को काफी नुकसान पहुंचा सकता है। गुलाल को पानी से साफ करने की अपेक्षा किसी साफ कपड़े से झाडिय़े। सूखे रंग कभी भी चेहरे पर नहीं लगाने चाहिए क्योंकि यह नाक और मुंह के जरिए शरीर के अंदर प्रवेश कर अदंरूनी हिस्सों को क्षति पहुंचा सकता है। कई रंगों में जिंक क्लोराईड नामक पदार्थ मिलाया जाता है। यह स्वास्थ्य के वास्ते बेहद हानिकारक है तथा त्वचा में खुजली पैदा करता है। त्वचा हमारे शरीर का रक्षा कवच है। यह विजातीय पदार्थों को शरीर के रक्त में पहुंचने से रोकती है। जिन व्यक्तियों के शरीर पर कोई घाव आदि है तो उन्हें होली नहीं खेलनी चाहिए। क्योंकि रंगों में मिले रासायनिक तत्व घाव के माध्यम से शरीर के रक्त में मिलकर नुकसान पहुंचा सकते हैं। होली पर रंग खेलिए जरूर, किंतु लगातार रंगों में मत रहिए। थोड़ी-थोड़ी देर में रंग-गुलाल झाड़कर साफ करत रहिए। गाड़ेपन के मोह में तेजाबी और रासायनिक रंगों का प्रयोग करने से बेहतर होगा कि प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया जाए। रंग लगवाते समय आंखों के अलावा मुंह भी हमेशा अच्छी तरह बंद रखिए।
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March 15th, 2011
cls
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