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क्या करे, यदि एक्सीडेंट हो जाये ?

Posted by cls On October - 12 - 2008

ड्राइविंग करते समय कभी छोटे मोटे एक्सीडेंट का सामना हो सकता है। मामला हल्का – फुल्का हो तो फिर भी बातचीत से सुलझ जाता है , लेकिन सीरियस ऐक्सिडंट की स्थिति में बात पुलिस , मुआवजे , कोर्ट आदि तक पहुंच जाती है। सड़क हादसों से जुड़े कुछ पहलुओं के बारे में विस्तार जानिये-

जब एक्सीडेंट में दूसरे के वाहन का नुकसान हो जाए

आपसी समझ के आधार पर मामले को निपटाने की कोशिश करे। दोनों पक्ष नुकसान का हर्जाना ले – देकर बात को आई – गई कर सकते हैं। जिसका ऐक्सिडंट हुआ है , उसे समझाया जा सकता है कि अगर मामला पुलिस के पास गया , तो उसे भी परेशानी झेलनी पड़ेगी। गाड़ी भी कई दिन तक थाने में बंद रहेगी।

मामला पुलिस के पास पहुंचता है , तो पुलिस जमानती धारा 279 लगा सकती है। इसमें रैश ऐंड नेग्लिजंट ड्राइविंग के लिए 6 महीने की कैद या एक हजार रुपये का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।

जब सामनेवाला मामूली जख्मी हो जाए

ऐसे मामलों में या तो सहमति होने में वक्त लगता है या फिर लेन – देन को लेकर दोनों पक्ष अड़ जाते हैं और बात थाने तक जा पहुंच जाती है। यदि आपके पास वैध लाइसंस है , गाड़ी इंश्युअर्ड है और कागजात पूरे हैं , तो थर्ड पार्टी क्लेम के तहत जितना मुआवजा कोर्ट तय करती है , उसका भुगतान बीमा कंपनी कर देती है।

हल्की चोटें आने पर आईपीसी की जमानती धारा 337 के तहत मामला बनता है। इसमें 6 महीने की कैद या पांच सौ रुपये जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। पुलिस डेंजरस ड्राइविंग करने पर मोटर वीइकल ऐक्ट की धारा 184 के तहत भी मामला दर्ज कर सकती है , जिसमें एक हजार रुपये फाइन या एक महीने की सजा या दोनों हो सकते हैं। पुलिस सिर्फ फाइन कर सकती है , सजा देना कोर्ट का काम है।

यदि सामनेवाला गंभीर रूप से जख्मी हो जाए

अगर सामने वाला गंभीर रूप से घायल हो जाए , तो वह इलाज का खर्च मांगने के साथ गाड़ी को होने वाले नुकसान का मुआवजा भी मांग सकता है। मोटर ऐक्सिडंट क्लेम के एक्सपर्ट , ऐडवकेट पुनीत अग्रवाल के मुताबिक , यदि इस दौरान घायल के काम – धंधे का नुकसान होता है , तो कोर्ट उसकी आमदनी के हिसाब से एवरेज निकाल कर उसकी भरपाई करवा सकती है। स्थायी विकलांगता आने पर अलग से मुआवजा देना पड़ता है। इस मामले में भी सारा खर्च इंश्युअरंस कंपनी देती है।

आईपीसी की जमानती धारा 338 लगाई जाती है , जिसमें 2 साल की सजा या एक हजार रुपये जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। अगर ऐक्सिडंट करने वाला पुलिस के सामने सरेंडर कर देता है या फिर घायल को हॉस्पिटल ले जाता है , तो क्या उसके खिलाफ दर्ज होने वाले मामले में नरमी बरती जाती है ?

पुलिस के अनुसार केस तो तब भी उन्हीं धाराओं में दर्ज होगा और कोई नरमी नहीं बरती जाएगी। परन्तु कोर्ट चाहे तो ऐसे मामलों में रियायत कर सकती है।

जब सामनेवाले की मौत हो जाए

मौत होने पर कोर्ट द्वारा 50 हजार रुपये की फिक्स्ड राशि बीमा कंपनी से पीड़ित परिवार को दिलवाई जाती है। बाद में सबूतों और मरने वाले की उम्र , आर्थिक हैसियत , उसके आश्रितों की संख्या व उनकी उम्र के हिसाब से कोर्ट मुआवजा तय करती है। यह बीमा कंपनी को देना होता है।

इसमें जमानती धारा 304 ए के तहत मुकदमा बनता है। इसमें 2 साल की सजा या कोर्ट के विवेकानुसार जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। अगर ऐक्सिडंट करने वाला सबूत मिटाने की कोशिश करता है , तो धारा 201 लगेगी। इसमें 7 साल की सजा व जुर्माना हो सकता है। मौत होने पर गैर जमानती धारा 304 भी लगाई जा सकती है।

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