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गर्भावस्था और श्वास रोग

Posted by cls On October - 1 - 2008

गर्भावस्था में स्त्री का स्वस्थ रहना बहुत जरुरी है। इस अवस्था में दमा रोग के प्रकोप से मां और बच्चे दोनों की जान को खतरा हो जाता है।

दमा रोग, गर्भावस्था पर इसका प्रभाव और बचाव के उपाय

यह एक वंशानुगत रोग है। इसमें एलर्जिक तत्त्वों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इसके परिणामस्वरुप दमारोगी की श्वास नलियां अधिक संवेदनशील हो जाती है जिससे इनमें सूजन और सिकुडन आ जाती है। एक बार श्वास नलियों के अधिक संवेदनशील हो जाने के बाद संबन्धित एलर्जिक तत्त्व के सम्पर्क मात्र से इन श्वास नलियों में सूजन और सिकुडन आ जाती है। एलर्जिक तत्त्व कुछ भी हो सकते है, जैसे धूल कण, पशु-पक्षियों का मल मूत्र, पंख अथवा बाल, धुआं, तेज गंध, ठंडी हवा, फंगस आदि आदि। स्वस्थ गर्भवती स्त्री को भी हारमोन्स के प्रभाव से गंभीर श्वसन का आभा स होता है, इसे दमा या श्वास रोग न समझे।

नियंत्रित दमा रोग का गर्भावस्था पर कोई विपरित असर नहीं पडता, परन्तु अनियंत्रित दमा रोग शिशु और मां दोनों के लिये खतरनाक हो सकता है।


गर्भवती महिला को चाहिये कि धूल, धुआं आदि एलर्जिक वस्तुओं के सम्पर्क में न आवे। धूम्रपान न करे। कृत्रिम सौंदर्य साधन एवं परफ्यूम्स का उपयोग कम करे। ठंडी हवा से बचे। हल्का भोजन करे। तीखे मसाले वाला भोजन गले एवं पेट में जलन पैदा करता है। घी तेल का उपयोग कम करे।

उपचार-

यह रोग उचित इलाज लेने पर पूरी तरह ठीक हो जाता है। इलाज के लिये दवा का प्रयोग गोली और इंजेक्शन के बजा इनहेलर्स से करना अधिक फायदेमंद और सुरक्षित है। इनहेलर्स दो प्रकार के होते है-

  1. राहतकारी इनहेलर्स- ये श्वसन मार्ग की सिकुडन कम करते है और तुरन्त प्रभावकारी है। इनका उपयोग दमा रोग का प्रकोप होने पर किया जाता है।
  2. निवारक इनहेलर्स (स्टीरॉइड)- ये श्वसन मार्ग की सूजन कम करते है और श्वास नलियों की संवेदनशीलता में उत्तरोत्तर कमी करते है।

समय रहते इलाज न करने पर श्वास नलियों की सूजन और सिकुडन स्थायी हो जाती है।

श्वास रोग होने पर दवा, इंजेक्शन या इनहेलर्स का उपयोग डॉक्टर की सलाह से करे।

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