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Swine Flu – Facts , Precautions and Treatments 01

Posted by cls On August - 16 - 2009

सेफ्टी स्वाइन फ्लू से
ग्लोबल होती दुनिया का एक नया चेहरा है । मार्च 2009 में मैक्सिको में शुरू हुआ स्वाइन फ्लू धीमे – धीमे भारत में भी फैलता  जा रहा है। इस बीमारी  से डरने के बजाय जरुरत है इसके लक्षणों के बारे में जानने और सावधानी बरतने की । एक्सपर्ट्स के अनुसार स्वाइन फ्लू से सेफ्टी के तमाम पहलुओं के बारे में जानकारियां:

Swine flu hits India

क्या है एच 1 एन 1 स्वाइन फ्लू इनफ्लुएंजा
स्वाइन फ्लू श्वसन तंत्र से जुड़ी एक बीमारी है , जो ए टाइप के इनफ्लुएंजा वायरस से होती है। यह वायरस एच 1 एन 1 के नाम से जाना जाता है और मौसमी फ्लू में भी यह वायरस सक्रिय होता है। लेकिन सामान्य फ्लू और स्वाइन फ्लू के वायरस में एक फर्क होता है। स्वाइन फ्लू के वायरस में चिड़ियों , सूअरों और इंसानों में पाया जाने वाला जेनेटिक मटीरियल भी होता है। अब स्वाइन फ्लू का जो वायरस फैल रहा है , वह पूरी तरह से इंसानों में विकसित हुआ वायरस है।

कैसे फैलता है स्वाइन फ्लू
जब आप खांसते या छींकते हैं तो हवा में या जमीन पर या जिस भी सतह पर थूक , या मुंह और नाक से निकले दव कण गिरते हैं , वह वायरस की चपेट में आ जाता है। ये कण हवा के द्वारा या किसी के छूने से दूसरे व्यक्ति के शरीर में मुंह या नाक के जरिए प्रवेश कर जाते हैं। मसलन , दरवाजे , फोन , की बोर्ड या रिमोट कंट्रोल के जरिए भी ये वायरस फैल सकते हैं , अगर इन चीजों का इस्तेमाल किसी संक्रमित व्यक्ति ने किया है।

अन्य जानकारियां

  1. इस बीमारी से लड़ने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है दिमाग से डर को निकालना।
  2. ज्यादातर मामलों में वायरस के लक्षण कमजोर ही दिखते हैं।
  3. जिन लोगों को स्वाइन फ्लू हो भी जाता है , वे इलाज के जरिए सात दिनों में ठीक हो जाते हैं।
  4. कुछ लोगों को तो अस्पताल में एडमिट भी नहीं होना पड़ता और घर पर ही सामान्य बुखार की दवा और आराम से ठीक हो गए , जबकि कुछ लोगों को तो ठीक होने के बाद ही पता चला कि उन्हें स्वाइन फ्लू था।
  5. डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट बताती है कि जिन लोगों का स्वाइन फ्लू टेस्ट पॉजिटिव आता है , उनमें से इलाज के दौरान मरने वालों की संख्या केवल 0.4 फीसदी ही है। यानी एक हजार लोगों में चार लोग। इनमें भी ज्यादातर केस ऐसे होते हैं , जिनमें पेशंट पहले से ही हार्ट या किसी दूसरी बीमारी की गिरफ्त में होते हैं या फिर उन्हें बहुत देर से इलाज के लिए लाया गया होता है। 

 कब करवाएं टेस्ट- जब इनमें से कोई दो लक्षण नजर आएं –

  1. बुखार
  2. बहुत तेज जुकाम , जिसमें नाक से पानी बहता रहता है और गले में खराश
  3. डायरिया
  4. लगातार उबकाई महसूस होना या उलटी होना
  5. सुस्ती और भूख न लगना
  6. कफ और इस वजह से सांस लेने में तकलीफ

कौन रहे ज्यादा सावधान

  1. 5 साल से कम उम्र के बच्चे , 65 साल से अधिक उम्र के बुजुर्ग और गर्भवती महिलाएं विशेष सावधानी बरते.
  2. इसके अलावा जिन लोगों को निम्न में से कोई एक बीमारी है , उन्हें अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए :
    1. - फेफड़ों , किडनी या दिल से जुड़ी बीमारी
    2. - मस्तिष्क संबंधी ( न्यूरोलॉजिकल ) बीमारी मसलन , पर्किन्सन
    3. - कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग
    4. - डायबीटीज के रोगी
    5. - ऐसे लोग जिनको पिछले 3 साल में कभी भी अस्थमा की शिकायत रही हो या अब भी हो
  3. ऐसे लोगों को फ्लू के शुरुआती लक्षण दिखते ही डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।
  4. गर्भवती महिलाएं रखें खास ध्यान
    1. गर्भवती महिलाओं का प्रतिरोध तंत्र ( इम्यून सिस्टम ) शरीर में होने वाले हॉर्मोन संबंधी बदलावों के कारण कमजोर होता है।
    2. खासतौर पर गर्भावस्था के तीसरे चरण यानी 27 वें से 40 वें सप्ताह के बीच उन्हें ज्यादा ध्यान रखने की जरूरत है। इसलिए गर्भवती महिलाएं फ्लू के शुरुआती लक्षण दिखते ही अपने डॉक्टर से संपर्क करें और जल्द से जल्द एंटी – वायरल मेडिसिन लें।
  5. बच्चों का रखें ध्यान , ये रहे इमरजेंसी वॉर्निंग साइन :
    1. - अगर जोर से सांस ले रहे हैं , जल्दी – जल्दी सांस ले रहे हैं या सांस लेने में किसी किस्म की तकलीफ हो रही है
    2. - त्वचा की रंगत नीली होती जा रही है
    3. - बच्चा पर्याप्त मात्रा में पानी नहीं पी रहा है
    4. - सुबह देर तक बिस्तर पर पड़ा रहता है या किसी से बात करने के बजाय गुमसुम रहता है
    5. - गोद में लेते ही बच्चा चीखने , रोने लगता है
    6. - फ्लू के लक्षण कई बार ठीक होते दिखते हैं , लेकिन सावधानी बरतें क्योंकि यह एक बार फिर कफ और बुखार के साथ लौट सकता है
    7. - बुखार के साथ रैशेज आ रहे हों , तो भी चिंता की बात है
  6. वयस्कों के लिए वॉर्निंग साइन :
    1. - सांस लेने में दिक्कत
    2. - पेट या सीने में दर्द या दबाव महसूस होना
    3. - अचानक से सिर में दर्द होना
    4. - लगातार उलटी होना या उबकाई महसूस होना

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