किसी में स्वाइन फ्लू के लक्षण दिखने पर मरीज को-
- तुरन्त अपने नजदीक स्थित उस अस्पताल में जाएं , जहां स्वाइनफ्लू के इलाज की व्यवस्था हो.
- ज्यादा जानकारी के लिए टॉल – फ्री नंबर 011-23921401 पर कॉल करे। यह नंबर सातों दिन और चौबीसों घंटे काम कर रहा है। इसके अलावा अस्पतालों के हेल्पलाइन नंबर पर भी कॉल कर सकते हैं।
- http://mohfw.nic.in/ इस वेबसाइट के स्वाइनफ्लू सेक्शन पर जानकारी ले सकते हैं। वेबसाइट के होमपेज पर टॉप पर स्वाइन फ्लू संबंधी लिंक है , जिस पर क्लिक करते ही आप फ्लू से जुड़ी गाइडलाइंस और तमाम दूसरी जानकारियां हासिल कर सकते हैं।
स्वाइनफ्लू की आशंका होने पर क्या करें
- फौरन डॉक्टर से संपर्क करें।
- पीड़ित व्यक्ति को एच 1 एन 1 संक्रमण होने की आशंका है , तो नजदीकी अस्पताल में जाकर टेस्ट करवायें।
- स्वाइन फ्लू वायरस संक्रमण की आशंका होने पर गले से स्वैब सैंपल लेकर , टेस्ट के लिए भेजा जाता है।
- अगर सैंपल लिया गया है , तो पेशंट को टैमीफ्लू दवा दी जाएगी , यानी सैंपल लेते ही दवा का कोर्स शुरू कर दिया जाएगा।
- पेशंट की स्थिति गंभीर होने पर उसे फौरन स्वाइन फ्लू वॉर्ड में एडमिट करवाये।
- स्वाइन फ्लू टेस्ट रिपोर्ट पॉजिटिव आती है , तो उसे अस्पताल या घर में एक अलग कमरे रख कर इलाज जारी रखे। इस दौरान संक्रमण न फैलने पाए इसका खास ध्यान रखे।
- स्वाइन फ्लू संक्रमण से ग्रस्त लोगों के संपर्क में आने वालों का भी फ्लू टेस्ट करवाये।
कैसे होती है संदिग्ध मरीजों की पहचान
- सिर दर्द ,
- बुखार ,
- गले में खरास ,
- कफ ,
शरीर के किसी हिस्से में दर्द और छोटे बच्चों में सांस लेने में दिक्कत महसूस होने जैसे लक्षण वाले मरीजों से यह पूछा जाता है कि वह हाल में विदेश से तो नहीं लौटा या स्वाइन फ्लू पीड़ित या इसके संदिग्ध मरीज के संपर्क में तो नहीं आया। अगर इनमें से कोई बात सामने आती है तो तुरंत सैंपल लेकर जांच के लिए एनआईसीडी भेज दिया जाता है और रिपोर्ट आने तक जरूरी हो तो मरीज को हॉस्पिटल में भर्ती किया जाता है वरना सावधानी बरतने की सलाह के साथ घर भेज दिया जाता है , लेकिन हॉस्पिटल की टीम मरीज पर नजर रखती है।
संदिग्ध मरीजों को सलाह
- घर में बाकी लोगों से दूर रहें
- घर से बाहर न निकलें
- मरीज और उसके संपर्क में आने वाले सभी लोग मास्क पहनें
- आराम करें और लिक्विड चीजें ज्यादा लें
- डॉक्टर की सलाह के मुताबिक दवा आदि लें
कैसे होती हैं सैंपल की जांच
स्वाइन फ्लू बुखार की पुष्टि के लिए ‘ रीयल टाइम पीसीआर ‘ टेस्ट किया जाता है। संदिग्ध मरीज के गले से कफ या थूक ( सिक्रेशन ) लिया जाता है। अमूमन जांच रिपोर्ट 24 घंटे के अंदर आ जाती है। सिक्रेशन में एच 1 एन 1 वायरस के राइबो न्यूक्लिक एसिड ( आरएनए ) देखा जाता है। जांच दो चरणों में की जाती है। प्रत्येक चरण में लगभग 12 घंटे का समय लगता है।
इलाज के विकल्प
- पैरासिटामॉल- ज्यादातर लोग फ्लू के लक्षण दिखने पर अगर पर्याप्त आराम करते हैं और पैरासिटामॉल टैब्लेट लेते हैं , तो उन्हें आराम मिलता देखा गया है। इस दवा के इस्तेमाल से बुखार कम होने लगता है और फ्लू के दूसरे लक्षण भी कम होने लगते हैं।
- एंटी – वायरस – डब्ल्यूएचओ ने अभी तक सिर्फ टैमीफ्लू को ही स्वाइन फ्लू के इलाज के दवा के तौर पर रिकमंड किया है। अगर किसी में भी स्वाइन फ्लू के शुरुआती लक्षण दिखते हैं , तो उसे टैमीफ्लू दी जाती है। टैमीफ्लू वायरस को पूरी तरह से खत्म नहीं करती , लेकिन बीमारी को खत्म करने में मदद करती है। इसके साथ ही टैमीफ्लू स्वाइनफ्लू वायरस की वजह से होने वाली दूसरी बीमारियों मसलन , न्यूमोनिया आदि से लड़ने में मददगार होती है। एंटी – वायरल्स वायरस को पूरी तरह से खत्म नहीं करतीं , लेकिन उनकी संख्या में वृद्धि होने से रोकती हैं। सामान्य फ्लू के वायरस अपने आप सात दिन में खत्म हो जाते हैं।
- एंटीबायोटिक्स – एंटीबायोटिक्स का स्वाइन फ्लू संक्रमण करने वाले वायरस पर कोई असर नहीं होता है। लेकिन अगर किसी पेशंट को सेकंडरी बैक्टीरियल इनफेक्शन हो जाता है , तो उसे एंटीबायोटिक्स दी जा सकती हैं। मसलन , अगर किसी पेशंट को सीने में इन्फेक्शन की शिकायत है , तो ये दवाई दी जाएंगी।
- वैक्सीन – फिलहाल स्वाइन फ्लू की कोई भी वैक्सीन बाजार में उपलब्ध नहीं है। हालांकि दो वैक्सीन डिवेलपमेंट की फाइनल स्टेज में हैं। उम्मीद की जा रही है कि साल 2009 के अंत तक वैक्सीन तैयार हो जाएगी।
स्वाइन फ्लू न हो , इसके लिए क्या करें
- बुखार , सर्दी , खांसी और नाक बहने जैसे लक्षण दिखते हैं तो फौरन हॉस्पिटल जाएं।
- फौरन डॉक्टर के पास नहीं जा सकते हैं तो ज्यादा से ज्यादा दो दिन पैरासिटामॉल ( क्रोसिन आदि ) लेकर देख सकते हैं।
- दो दिन में बुखार उतर जाए और अच्छा महसूस हो तो घबराने की बात नहीं , लेकिन लक्षण बढ़ते जाएं तो फौरन किसी बड़े अस्पताल में जाएं , जहां स्वाइन फ्लू के इलाज की व्यवस्था हो।
- बीमारी के बाद के पहले तीन दिन काफी महत्वपूर्ण होते हैं। इसी स्टेज पर इलाज शुरू हो जाए तो मरीज के ठीक होने की 100 फीसदी गारंटी रहती है।
- मरीज को खांसते या छींकते समय हमेशा रूमाल का इस्तेमाल करना चाहिए।
- मरीज को अच्छी तरह हवादार कमरे में रखें।
- वह आराम करे और खुले में न तो थूके , न खांसे और न ही छींके।
- अच्छा और न्यूट्रीशियस फूड लें और बाहर और दूसरे के संपर्क में न जाएं।
- मरीज को घर के ऐसे कॉमन एरिया में न जाने दें , जहां परिवार के दूसरे सदस्य रहते हैं।
- कोशिश करें कि मरीज रूम में अकेला ही सोए। अगर ऐसा नहीं हो सकता है तो इस बात का ध्यान रखें कि मरीज और रूम शेयर करने वाले दूसरे आदमी का मुंह सोते समय विपरीत दिशा में हो।
- मरीज हर समय मास्क पहन कर रखें।
- अगर मास्क उपलब्ध न हो तो साफ कपड़े के टुकड़े , रूमाल या टिश्यू पेपर से मुंह और नाक को पूरी तरह ढक कर रखें।
- इस्तेमाल किए गए मास्क , टिश्यू पेपर आदि को ढक्कनदार और पॉलीथीन से कवर्ड डस्टबिन में ही फेंकें।
- मरीज स्मोकिंग न करें , दूसरे लोगों से क्लोज कॉन्टैक्ट में आने से बचें , हमेशा कम से कम एक हाथ की दूरी बनाकर रखें।
- बाहर से आने वालों से न मिलें और हॉस्पिटल जाने के अलावा बाहर बिल्कुल न निकलें।
- अपने हाथ बार – बार साबुन या किसी और हैंडवॉश से साफ करें।
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