दो भूखे आलसी फलों से लदे आम के एक पेड़ के नीचे बहुत देर से मुँह खोलकर लेटे हुए थे ताकि उन पर दया करके पेड़ उनके मुँह में आम टपका दे। बहुत इंतजार के बाद एक आम एक आलसी की छाती पर टपका।
अब मुसीबत यह थी कि आम को उसके मुँह में डाले कौन। वह खुद तो उठाकर खाने से रहा, आलसी जो ठहरा। कुछ समय बाद वहाँ से गुजरते एक व्यक्ति की नजर उन पर पड़ी। उस समय एक कुत्ता उस आलसी का मुँह चाट रहा था। उसने सोचा नजदीक जाकर देखता हूँ, माजरा क्या है? वहाँ पहुँचकर उसने कुत्ते को भगाया और फिर आलसियों से पूछा- क्यों भाई! जिंदा हो या मर गए?
एक आलसी बोला- शुभ-शुभ बोलो भैया। हम तो भले-चंगे हैं और तुम्हारे जैसे भले आदमी का इंतजार कर रहे थे जो मेरी छाती पर पड़े आम को इस भूखे को खिलाकर पुण्य कमाए। यह सुनते ही वह व्यक्ति समझ गया कि उसका पाला किससे पड़ा है। फिर भी वह बोला- मैं क्यों खिलाऊँ, तुम खुद खा लो।
इस पर दूसरा आलसी बोला- अरे भैया, तुम भी इस आलसी से ऐसी उम्मीद कर रहे हो। रातभर कुत्ता इसका मुँह चाटता रहा लेकिन मजाल है कि ये उसे भगाए। व्यक्ति- तो तुम ही भगा देते। दूसरा आलसी- मैं कैसे भगाता, मैं तो लेटा हुआ था ना।
इस पर उस व्यक्ति ने अच्छा-अच्छा कहते हुए आलसी की छाती पर पड़े आम को उठाकर घुमाना शुरू कर दिया। उसे ऐसा करते देख दोनों ने अपने मुँह खोल लिए, लेकिन उस व्यक्ति ने आम खुद ही खाना शुरू कर दिया और उन्हें ठेंगा दिखाता हुआ आगे बढ़ गया।
दोस्तो, हाथ आए मौके को या तो क्रेजी (पागल) गँवाता है या फिर लेजी (आलसी)। वह आम एक मौका ही तो था जिसे उन दोनों ने अपने आलस के कारण गँवा दिया। और उस बुद्धिमान व्यक्ति ने हाथ आए मौके को हाथ से नहीं जाने दिया बल्कि उसका भरपूर मजा उठाया और आलसियों के हिस्से में आया ठेंगा।
आलसियों को इससे ज्यादा मिल भी क्या सकता है, मिलता भी नहीं। वैसे वे दोनों गलतफहमी में जी रहे थे कि वे भले-चंगे हैं। जिस व्यक्ति के शरीर में उसका सबसे बड़ा दुश्मन यानी आलस्य स्थायी रूप से कब्जा जमाकर बैठा हो, वह भला-चंगा कैसे हो सकता है।
आलस व्यक्ति की सोचने-समझने की शक्ति को कमजोर कर देता है। ऐसे में वह जीवित होकर भी मृत के समान ही होता है। उसका होना या न होना बराबर होता है, क्योंकि वह किसी और की मदद करना तो दूर की बात है, खुद ही दूसरों के आसरे, उनकी मदद पर रहता है। यह भी नहीं है कि वह करना कुछ नहीं चाहता। नहीं, आलसी हमेशा बहुत कुछ करने की इच्छा रखता है, सोचता है, सपने देखता है, बड़ी-बड़ी बातें करता है, लेकिन करता कुछ नहीं।
यदि आप में भी ऐसी ही कोई प्रवृत्ति है, तो इसका मतलब है कि आप भी आलसी हैं। आप भी यह बात जानते-समझते होंगे। इसलिए यदि आप वाकई कुछ करना चाहते हैं, तो जो करना चाहते हैं, उसे करके भी दिखाएँ। यदि आलस रोड़े अटका रहा है तो उसे चुस्ती दिखा दें। यकीन मानिए, सुस्ती को चुस्ती से बहुत डर लगता है। वह उसकी परछाई से भी घबराती है। इसलिए यदि आप थोड़ी-सी भी चुस्ती दिखाएँगे तो सुस्ती आपके शरीर से दूर चली जाएगी। इसके बाद तो आप जो करने की सोचेंगे, उसे कर दिखाएँगे, क्योंकि आलसी होने की वजह से रूठा आपका ईश्वर आपकी मदद जो करेगा।
कई लोग आलस का मतलब सोने-सुलाने से लेते हैं और सोचते हैं कि हम तो बहुत कम सोते हैं, फिर आलसी कैसे हुए। ऐसी सोच भी गलत है, क्योंकि किसी भी प्रकार की सुस्ती आलस की श्रेणी में ही आती है।
आज के प्रतिस्पर्धी युग में जबकि एक क्षण की सुस्ती भी हमारी किस्मत बिगाड़ सकती हो, तो हमें हर वक्त चुस्त और सचेत रहना चाहिए ताकि जैसे ही मौका मिले, उसे लपका जा सके। इसलिए सुस्त नहीं, चुस्त बनें ताकि आपकी सुस्ती आपको सस्ते के भाव न निपटाए। वरना आजकल यह आम बात है कि किसी की छाती पर गिरे अवसर के आम का मजा कोई दूसरा ही लूट रहा होता है। आशा है आप अपने ऐसे आम का मजा खुद ही लेंगे।
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आलस – मनुष्य का सबसे बडा दुश्मन
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