विवाह करने जा रहे युवक-युवती की बातें कभी खत्म नहीं होती । वे रूबरू मिलें या फोन पर संवाद कायम करें, उन्हें वक्त की कमी हमेशा खलती है। बातें हैं कि खत्म ही नहीं होती। लगभग यही स्थिति विवाह के बाद शुरूआती दिनों में भी होती है। दोनों के पास अगली पिछली बातों का असीम भंडार रहता है। यह स्थिति एकाएक पलटा जाती है जब सुनने व बोलने से न उकताने वाले प्रेमी युगल माता-पिता बन जाते हैं।

Just Married
वे जैसे ही गृहस्थी व परिवार की जिम्मेदारियों को महसूस करने लगते हैं, उनकी बातें न जाने कहां खो जाती हैं और संवादहीनता के अभाव में गलतफहमियां व शिकायतें उभरने लगती हैं। ऐसा लगता है कि जिम्मेदारियों व बच्चों का दायित्व संवाद में बाधक है। वस्तुत: माता-पिता बने पति-पत्नी इस नई व्यस्तता के कारण उपजी खीज से अस्त व्यस्त हो जाते हैं और अपनी समीपता ही गवां देते हैं। इसका परिणाम होता है उनके बीच संवादहीनता।
धीरे-धीरे यह संवादहीनता उनके बीच राई का पहाड़ बन जाती है और कई परेशानियां पैदा होने लगती हैं। अपने जीवन साथी से संवाद कायम किये रहना चाहिए। यदि लगे कि जीवन साथी से संम्पर्क टूट सा रहा है तो उसे पुन: स्थापित करने का प्रयत्न जरूर होना चाहिए। पति-पत्नी को एक दूसरे से जुड़ाव का प्रयत्न हर रोज करना चाहिए। एक दूसरे के बारे में पूछना, पास बैठना, चाय साथ-साथ पीना व संगी को पूछना इसलिए जरूरी है कि इससे दोनों को लगेगा कि वे एक दूसरे के प्रति चिंतित हैं, उन्हें अपने साथी की परवाह है।
बातचीत के मौके तो दिन भर में जब जब पति-पत्नी साथ रहते हैं तो खूब मिलते हैं। बस इनका उपयोग करना आना चाहिए गलतियों पर तत्काल टिप्पणी करने से बचना व तारीफ लायक कामों पर प्रतिक्रिया देना ऐसा सकारात्मक प्रयत्न है जो दंपत्ति को सद्भावना से जोड़े रखेगा। ऐसी बातचीत निकटता का अहसास कराती है। ऐसे में नन्हा सा स्पर्श रोमांच पैदा करके चित्त को खुशी से भर देगा।
पति-पत्नी एक दूसरे से हुई दूरियों की चर्चा कर सकते हैं। जब एक पक्ष कुछ पूछना चाहे, बातचीत का सिलसिला शुरू करना चाहे तो दूसरे पक्ष को उसका सिरा पकड़ कर चर्चा करनी चाहिए ताकि इसी बीच दूसरी बातें भी हो सकें। प्राय: ऐसा होता नहीं है। कुछ काम संग-संग करना संबंधों को जीवंत करता है व पति पत्नी में प्रगाढ़ अपनत्व लाता है। पति पत्नी को चाहिए कि कभी घर के तनावों व समस्याओं से उध्दिग्न होकर कड़वाहट उगलने को आतुर हों तो भी उन्हें अपनी तरफ से आक्रामक व्यवहार से सदा बचना चाहिए।
कड़वा बोलने का मन करे तो चुप रहना, मौन हो जाना व केवल श्रोता धर्म निभाना ठीक है। कभी भी ‘तुम हमेशा ऐसा ही करते हो या करती हो जैसे वाक्य से संवाद शुरू न करें। यह हमेशा शब्द का प्रयोग अब तक के अच्छे कामों पर पानी फेर देता है। इससे व्यक्ति तुरन्त प्रतिरक्षा की मु्रा में आ जाता है। अत: यथासंभव आक्रामक रुख व आलोचना से बचें। यदि कोई शिकायत करनी भी होतो उसके साथ संभावित समाधान भी प्रस्तुत करें जो निश्चय ही सद्भावनापूर्ण व्यवहारिक वातावरण बना देगा।

खानपान के सम्बन्ध में लेटेस्ट फैशन यह है कि खाने में कच्ची चीजें, बिना प्रोसेस किए गये या बिना कुक किए हुए फूड्स शामिल करना। सवाल यह है कि इससे फायदा क्या है? पका हुआ भोजन पेट व आंतों से बहुत धीमे-धीमे पास होता है, जबकि कच्चा फूड यह समस्याएं खड़ी नहीं करता, क्योंकि उसमें ‘लाइव एंजाइम होते हैं जो अपना काम बखूबी निभाते हैं।
भोजन का सम्बन्ध सिर्फ खुराक भर से नहीं होता बल्कि महत्वपूर्ण बात यह है कि पचता क्या है? हर फूड का एंजाइम्स द्वारा तोड़ा जाना आवशयक है ताकि ऊर्जा व अन्य जरूरतें पूरी करने के लिए साधारण ब्लॉक्स बन सकें। एंजाइम्स को दो हिस्सों में रखा जा सकता है- एम्सोनीनस (जो कच्चो फूड में मिलते हैं) और एंडोजीनस (हमारे शरीर के अंदर निर्मित होते हैं) जिस्म को जितने ज्यादा एम्सोनीनस एंजाइम मिलेंगे उसे उतने की कम अन्य पाचन प्रक्रियाओँ और पैनक्रिआस से लेने पड़ेंगे। जब कच्चा फूड चबाया जाता है तो उसमें मौजूद एंजाइम पाचन में मदद करते हैं।
हम निश्चित मात्रा में इंडोजीनस एंजाइम के साथ पैदा होते हैं। मौजूदा औसत आयु को अगर मद्देनजर रखा जाए, तो यह हमारे पूरे जीवन के लिए काफी होते हैं, लेकिन अगर हम अपने आहार के जरिए कुछ एक्सोजीनस एंजाइम सप्लाई न करें, तो हम अपनी मूल सप्लाई का इस्तेमाल कर बैठेंगे और हमारे चेहरे पर बुढ़ापे के चिन्ह आने लगेंगे। यही नहीं, वक्त से पहले हमारी मौत भी हो सकती है। कच्चो फूड्स से हमें स्टैमिना, ताकत और लम्बी आयु मिलती है। कच्ची चीजों के सेवन को अक्सर बुढ़ापा विरोधी आहार भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें एंटी बॉडीज की अधिकता होती है। एंटीबॉडीज उन मुक्त तत्वों का मुकाबला करती है जो बुढ़ापे के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार होते हैं। इससे जिस्म को डिटोक्स रखने में मदद मिलती है और शरीर हाइड्रेटिड भी रहता है। वजन कम करने में भी यह
लाभकारी है।
जो लोग सिर्फ कच्चो फूड के आहार पर निर्भर करते हैं वह काफी पतले होते हैं और उनका बॉडी मॉस इंडेक्स भी कम होता है। इसका असर हड्डियों की सेहत पर पड़ता है क्योंकि कम बॉडी वेट और कम बॉडी फैट का अर्थ है ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा बढ़ जाना। साथ ही इन आहारों में अक्सर कैल्शियम की कमी होती है। ज्यादा लम्बे समय तक कोई भी व्यक्ति इन पर निर्भर व जिंदा नहीं रह सकता। इस किस्म के आहार के दीर्घकालीन लाभों पर सवालिया निशान हैं। हर कोई कच्चो फूड्स को बर्दाश्त नहीं कर सकता, क्योंकि हर किसी की पाचन क्षमता अलग है। इसके अलावा, एक निश्चित आहार पर कायम रहने से कैल्शियम, आयरन, प्रोटीन, कैलोरीज और बी-12 की कमी हो जाती है जिससे अनेक समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। अगर ‘कच्चो आहार के सहारे आप अच्छी सेहत बनाना चाहते हैं तो सही संतुलन स्थापित कीजिए और साथ में कम मात्रा में पका हुआ खाना भी खायें।
फूड से सम्बन्धित अधिकतर पेट के इंफेक्शंस कच्चो फूड्स से ही होते हैं, जिन्हे खाने से पहले अच्छी तरह से धोया नहीं गया है। किसी भी आहार-आधारित जीवनशैली को अपनाने के लिए प्रोफेशनल न्यूट्रीशनिस्ट से सलाह करें ताकि यह मालुम हो जाए कि आपको क्या सूट करता है।
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