जिन विषयों से हमारे अन्तःकरण में स्थित दुष्ट विचारों का नाश हो और सद्विचार पैदा हो तथा मन भगवान में लगने लगे, ऐसे विषय सत्सवरुप परमात्मा के साथ हमारा सम्बन्ध कराने वाले होने से सत् है और उनका संग सत्संग है।
इसलिये जहां तक बन सके देखने- सुनने, चर्चा करने, खाने पीने, पढने लिखने के विषय तथा आजीविका के कार्य, वातावरण और उपासना पद्धति आदि सभी कार्य ऐसे होने चाहिये, जो हमारे चारित्रिक विकास में सहायक हो।

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जैसे कुसंग से बुद्धि राजसी और तामसी हो जाती है, वैसे ही सत्संग से बुद्धि सात्त्विकी बनती है। सात्त्विकी बुद्धि से व्यक्ति में यथार्थ निर्णय करने की क्षमता बढती है और उसके प्रभाव से मनुष्य अपने वास्तविक कर्त्तव्य को पहचानकर उसपर आरुढ हो जाता है।
मनुष्य की तमसावृत्त बाहरी आंखें सतसंग के प्रकाश से ही खुलती है और सत्संग के बल से ही वह स्वः उत्थान के रास्ते पर आगे बढने का प्रयास कर पाता है। सत्संग के प्रभाव से
- संतों और भक्तों के आचरण अच्छे लगते है और वैसे आचरण और भक्ति की प्राप्ति के लिये व्यक्ति का मन मचल उठता है।
- भगवच्चर्चा, भगवदगुण नाम कीर्तन, भगवदगुण नाम श्रवण, और भगवच्चिन्तन में मन लगने लगता है।
- भगवान के गुण, प्रभाव, रहस्य और प्रेम की बातें सुनने से तथा भजन करने से विषयासक्ति और भोगकामना का नाश होकर भगवत्प्राप्ति की कामना पैदा होती है।
- सत्संग के प्रभाव से भोगों से सच्चा वैराग्य होता है, जिससे चित्त प्रमादशून्य, शान्त, प्रसन्न और ध्यानमय बन जाता है।
- अन्तःकरण में स्थित कामादि समस्त शत्रुओं का नाश होकर, निर्भयता आदि दैवी सम्पदा के छ्ब्बीस गुणों की उत्पत्ति एवं वृद्धि होती है।
- राग-द्वेष , ममता, अहंकार और अज्ञान का नाश हो जाता है।
- स्वाभाविक ही तन मन धन से संसार के जीवों की सेवा बनती है।
- सर्वत्र सब प्राणियों में सदा सर्वदा और सर्वथा भगवद्दर्शन होने लगते है।
- भगवत्तत्व का ज्ञान होकर सनातन दिव्य आनन्द और परम शान्ति तथा दिच्य प्रेम की प्राप्ति होती है।
- परम मधुर और परम आत्मीय अनन्त सौन्दर्य माधुर्य के सागर भगवान की परम सेवा के सामने मुक्ति भी तुच्छ लगने लगती है।
स्वयं भगवान श्रीउद्धवजी से कहते है-
न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापूर्तं न दक्षिणा॥
व्रतानि यज्ञश्छ्न्दांसि तीर्थानि नियमा यमाः।
यथावरुन्धे सत्संगः सर्वसंगापहो हि माम् ॥
(श्री मद्भागवत ११।१२।१-२)
हे उद्धव , दुसरे समस्त संगो का निवारण करने वाले, मेरे लीला गुणों का प्रकाश करने वाले सत्संग के द्वारा मैं जैसा वश में होता हूं, वैसा योग, ज्ञान, धर्म, स्वाध्याय, तप, त्याग, इष्टापूर्त, दक्षिणा, व्रत, यज्ञ, वेद, तीर्थ, यम और नियम किसी से नहीं होता।
जिस सत्संग से स्वयं भगवान वश में हो जाय, उससे बढकर और कौनसी साधना हो सकती है? ’शिव’
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October 30th, 2008
cls
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