शोक के प्रसंग में यह निश्चय करो कि मेरे लिये कभी शोक का प्रसंग नहीं आ सकता। प्रकृति जादूभरी और परिवर्तनशील है। इसमें पैदा होने और नष्ट होने का खेल सदा होता ही रहता है। रूप बदलता है, मूल वस्तु कभी नष्ट नहीं होती, फिर मैं शोक क्यों करुं? अथवा यह निश्चय करो कि मेरे स्वामी भगवान जो कुछ विधान करते है, उसी में मेरा परम कल्याण है और यही सत्य है। शोक करना स्वामी के विधान पर असन्तोष प्रकट करना है और सर्वथा अनुचित है, वस्तुतः भगवान हमारी भलाई के लिये ही सब कुछ करते है।
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