श्री रामचरितमानस

सुंदरकाण्ड
श्री राम गुणगान की महिमा
निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।
यह चरित कलि मल हर जथामति दास तुलसी गायऊ॥
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥
सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥६०॥
मासपारायण, चौबीसवाँ विश्राम
इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने
पंचमः सोपानः समाप्तः।
कलियुग के समस्त पापों का नाश करने वाले श्री रामचरितमानस
का यह पाँचवाँ सोपान समाप्त हुआ।
(सुंदरकाण्ड समाप्त)
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सुन्दर काण्ड
- मंगलाचरण
- श्री हनुमान्जी का लंका को प्रस्थान
- लंका वर्णन
- हनुमान्-विभीषण संवाद
- श्री हनुमान्जी अशोक वाटिका में
- श्री सीता-त्रिजटा संवाद
- श्री सीता-हनुमान् संवाद
- श्री हनुमान्जी द्वारा अशोक वाटिका विध्वंस
- श्री हनुमान्-रावण संवाद
- लंकादहन
- श्री हनुमान्जी का सीताजी से विदा माँगना
- श्री राम-हनुमान् संवाद
- श्री रामजी का समुद्र तट पर पहुँचना
- मंदोदरी-रावण संवाद
- रावण को विभीषण का समझाना
- विभीषण का श्री रामजी की शरण के जाना
- समुद्र पार करने के लिए विचार
- दूत का रावण को समझाना
- समुद्र पर श्री रामजी का क्रोध
- श्री राम गुणगान की महिमा
श्री रामचरितमानस
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