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Devotional Video – Visit www.hindudevotionalblog.com for Lyrics of Lord Ramraksha Stotra. Rama Raksha Stotram is the Sanskrit Hindu devotional song dedicated to Lord Sri Ram (Ramachandar), composed by Saint Budha Koushika. This devotional bhajan song posted by Msabhi Hindu Devotional Blog.

Devotional – Video
Visit www.hindudevotionalblog.com for Lyrics of Lord Ramraksha Stotra. Rama Raksha Stotram is the Sanskrit Hindu devotional song dedicated to Lord Sri Ram (Ramachandar), composed by Saint Budha Koushika. This devotional bhajan song posted by Msabhi Hindu Devotional Blog.

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Devotional Krishna Song-Sung Beautifully

Posted by Admin On August - 8 - 2009

Devotional Video – Devotional Krishna Song-Sung Beautifully, Same singer as Shiv Song,

Devotional – Video
Devotional Krishna Song-Sung Beautifully, Same singer as Shiv Song,

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Hindu Devotional-Shiv Song

Posted by Admin On August - 7 - 2009

Devotional Song, Sung Magically, Perfect, Please Leave COmments

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Radhe Radhe Govind Govind Radhe

Posted by cls On July - 18 - 2009
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Intel G45 Motherboard launched by Gigabyte

Posted by cls On February - 25 - 2009
Gigabyte has announced to launch its new Gigabyte GA-EG45M-UD2H motherboard. The product supports the latest Intel 45nm CPUs and integrates support for HDMI, DVI and HDCP, creating a powerful multi-media platform which allows users to do more at once.

Gigabyte GA-EG45M-UD2H is built from Intel G45 Express chipset, using Gigabyte’s Ultra Durable 3 technology with 2 oz Copper for ground and power layers.

It’s Dual channel DDR2 1066 by O.C. is set go give remarkable system performance At the same time the motherboard is integrated with Intel Graphics Media Accelerator X4500HD (Intel GMA X4500HD).

It has built-in TPM chip with 2048bits encryption to highest level digital data protection and features high speed Gigabit Ethernet and IEEE1394 connection.

The new GA-EG45M-UD2H has 2 ounces Copper and supports Intel’s 45nm Core 2 Duo processors with 1600 MHz overclocked Front Side Bus.

This motherboard supports up to 16GB of DDR2 RAM with 1066 MHz (overclocked) and has dual-channel memory architecture. Gigabyte has integrated HDMI port with HDCP support and boasts smoother HD and Blu-ray video playback. Price of the product is not released yet.

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श्री मद्गोस्वामी तुलसीदासजी रचित

श्री रामचरितमानस


सुंदरकाण्ड

श्री राम गुणगान की महिमा

निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।
यह चरित कलि मल हर जथामति दास तुलसी गायऊ॥
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥

सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥६०॥

मासपारायण, चौबीसवाँ विश्राम
इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने
पंचमः सोपानः समाप्तः।
कलियुग के समस्त पापों का नाश करने वाले श्री रामचरितमानस
का यह पाँचवाँ सोपान समाप्त हुआ।
(सुंदरकाण्ड समाप्त)

—-पीछे आगे—-


सुन्दर काण्ड
  1. मंगलाचरण
  2. श्री हनुमान्‌जी का लंका को प्रस्थान
  3. लंका वर्णन
  4. हनुमान्‌-विभीषण संवाद
  5. श्री हनुमान्‌जी अशोक वाटिका में
  6. श्री सीता-त्रिजटा संवाद
  7. श्री सीता-हनुमान्‌ संवाद
  8. श्री हनुमान्‌जी द्वारा अशोक वाटिका विध्वंस
  9. श्री हनुमान्‌-रावण संवाद
  10. लंकादहन
  11. श्री हनुमान्‌जी का सीताजी से विदा माँगना
  12. श्री राम-हनुमान्‌ संवाद
  13. श्री रामजी का समुद्र तट पर पहुँचना
  14. मंदोदरी-रावण संवाद
  15. रावण को विभीषण का समझाना
  16. विभीषण का श्री रामजी की शरण के जाना
  17. समुद्र पार करने के लिए विचार
  18. दूत का रावण को समझाना
  19. समुद्र पर श्री रामजी का क्रोध
  20. श्री राम गुणगान की महिमा

श्री रामचरितमानस

  1. बालकाण्ड
  2. अयोध्याकाण्ड
  3. अरण्यकाण्ड
  4. किष्किन्धाकाण्ड
  5. सुंदरकाण्ड
  6. उत्तरकाण्ड
  7. लंकाकाण्ड

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श्री मद्गोस्वामी तुलसीदासजी रचित

श्री रामचरितमानस


सुंदरकाण्ड

समुद्र पर श्री रामजी का क्रोध

बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥५७॥

लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानु॥
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीति। सहज कृपन सन सुंदर नीति॥१॥

ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी॥
क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा॥२॥

अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा॥
संधानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥३॥

मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना॥४॥

काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच॥५८॥

सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥।
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥१॥

तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहें सुख लहई॥२॥

प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं॥
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥३॥

प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई॥
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई॥४॥

सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ॥५९॥

नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाईं रिषि आसिष पाई॥
तिन्ह कें परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे॥१॥

मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई॥
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ॥२॥

एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी॥
सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा॥३॥

देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी॥
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा॥४॥

—-पीछे आगे—-


सुन्दर काण्ड
  1. मंगलाचरण
  2. श्री हनुमान्‌जी का लंका को प्रस्थान
  3. लंका वर्णन
  4. हनुमान्‌-विभीषण संवाद
  5. श्री हनुमान्‌जी अशोक वाटिका में
  6. श्री सीता-त्रिजटा संवाद
  7. श्री सीता-हनुमान्‌ संवाद
  8. श्री हनुमान्‌जी द्वारा अशोक वाटिका विध्वंस
  9. श्री हनुमान्‌-रावण संवाद
  10. लंकादहन
  11. श्री हनुमान्‌जी का सीताजी से विदा माँगना
  12. श्री राम-हनुमान्‌ संवाद
  13. श्री रामजी का समुद्र तट पर पहुँचना
  14. मंदोदरी-रावण संवाद
  15. रावण को विभीषण का समझाना
  16. विभीषण का श्री रामजी की शरण के जाना
  17. समुद्र पार करने के लिए विचार
  18. दूत का रावण को समझाना
  19. समुद्र पर श्री रामजी का क्रोध
  20. श्री राम गुणगान की महिमा

श्री रामचरितमानस

  1. बालकाण्ड
  2. अयोध्याकाण्ड
  3. अरण्यकाण्ड
  4. किष्किन्धाकाण्ड
  5. सुंदरकाण्ड
  6. उत्तरकाण्ड
  7. लंकाकाण्ड

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दूत का रावण को समझाना

Posted by cls On November - 1 - 2008

श्री मद्गोस्वामी तुलसीदासजी रचित

श्री रामचरितमानस


सुंदरकाण्ड

दूत का रावण को समझाना

की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर ॥५३॥

नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें॥
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा॥१॥

रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हें दुख नाना॥
श्रवन नासिका काटैं लागे। राम सपथ दीन्हें हम त्यागे॥२॥

पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई॥
नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी॥३॥

जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा॥
अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला॥४॥

द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि॥५४॥

ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना॥
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रैलोकहि गनहीं॥१॥

अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर॥
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं॥२॥

परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा॥
सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहिं न त भरि कुधर बिसाला॥३॥

मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा॥
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहुँ ग्रसन चहत हहिं लंका॥४॥

सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।
रावन काल कोटि कहुँ जीति सकहिं संग्राम॥५५॥

राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई॥
सक सर एक सोषि सत सागर। तव भ्रातहि पूँछेउ नय नागर॥१॥

तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं॥
सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा॥२॥

सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई॥
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई॥३॥

सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें॥
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी॥४॥

रामानुज दीन्हीं यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती॥
बिहसि बाम कर लीन्हीं रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन॥५॥

बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस॥५६क॥

की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।
होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग॥५६ख॥

सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई॥
भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा॥१॥

कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी॥
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा॥२॥

अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ॥
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही॥३॥

जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे॥
जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही॥४॥

नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ॥
करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई॥५॥

रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी॥
बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा॥६॥

—-पीछे आगे—-


सुन्दर काण्ड
  1. मंगलाचरण
  2. श्री हनुमान्‌जी का लंका को प्रस्थान
  3. लंका वर्णन
  4. हनुमान्‌-विभीषण संवाद
  5. श्री हनुमान्‌जी अशोक वाटिका में
  6. श्री सीता-त्रिजटा संवाद
  7. श्री सीता-हनुमान्‌ संवाद
  8. श्री हनुमान्‌जी द्वारा अशोक वाटिका विध्वंस
  9. श्री हनुमान्‌-रावण संवाद
  10. लंकादहन
  11. श्री हनुमान्‌जी का सीताजी से विदा माँगना
  12. श्री राम-हनुमान्‌ संवाद
  13. श्री रामजी का समुद्र तट पर पहुँचना
  14. मंदोदरी-रावण संवाद
  15. रावण को विभीषण का समझाना
  16. विभीषण का श्री रामजी की शरण के जाना
  17. समुद्र पार करने के लिए विचार
  18. दूत का रावण को समझाना
  19. समुद्र पर श्री रामजी का क्रोध
  20. श्री राम गुणगान की महिमा

श्री रामचरितमानस

  1. बालकाण्ड
  2. अयोध्याकाण्ड
  3. अरण्यकाण्ड
  4. किष्किन्धाकाण्ड
  5. सुंदरकाण्ड
  6. उत्तरकाण्ड
  7. लंकाकाण्ड

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श्री मद्गोस्वामी तुलसीदासजी रचित

श्री रामचरितमानस


सुंदरकाण्ड

समुद्र पार करने के लिए विचार

सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा॥
संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँति॥३॥

कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक॥
जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई॥४॥

प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि॥
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि॥५०॥

सखा कही तुम्ह नीति उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई।
मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा॥१॥

नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥
कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा॥२॥

सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा॥
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई॥३॥

प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई॥
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए॥४॥

सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह॥५१॥

प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ॥
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने॥१॥

कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर॥
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए॥२॥

बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे॥
जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना॥३॥

सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोड़ाए॥
रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती॥४॥

कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।
सीता देइ मिलहु न त आवा कालु तुम्हार॥५२॥

तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा॥
कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए॥१॥

बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता॥
पुन कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी॥२॥

करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जव कर कीट अभागी॥
पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई॥३॥

जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा॥
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी॥४॥

—-पीछे आगे—-


सुन्दर काण्ड
  1. मंगलाचरण
  2. श्री हनुमान्‌जी का लंका को प्रस्थान
  3. लंका वर्णन
  4. हनुमान्‌-विभीषण संवाद
  5. श्री हनुमान्‌जी अशोक वाटिका में
  6. श्री सीता-त्रिजटा संवाद
  7. श्री सीता-हनुमान्‌ संवाद
  8. श्री हनुमान्‌जी द्वारा अशोक वाटिका विध्वंस
  9. श्री हनुमान्‌-रावण संवाद
  10. लंकादहन
  11. श्री हनुमान्‌जी का सीताजी से विदा माँगना
  12. श्री राम-हनुमान्‌ संवाद
  13. श्री रामजी का समुद्र तट पर पहुँचना
  14. मंदोदरी-रावण संवाद
  15. रावण को विभीषण का समझाना
  16. विभीषण का श्री रामजी की शरण के जाना
  17. समुद्र पार करने के लिए विचार
  18. दूत का रावण को समझाना
  19. समुद्र पर श्री रामजी का क्रोध
  20. श्री राम गुणगान की महिमा

श्री रामचरितमानस

  1. बालकाण्ड
  2. अयोध्याकाण्ड
  3. अरण्यकाण्ड
  4. किष्किन्धाकाण्ड
  5. सुंदरकाण्ड
  6. उत्तरकाण्ड
  7. लंकाकाण्ड

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श्री मद्गोस्वामी तुलसीदासजी रचित

श्री रामचरितमानस


सुंदरकाण्ड

विभीषण का भगवान्‌ श्री रामजी की शरण में जाना

रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।
मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि॥४१॥

अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयू हीन भए सब तबहीं॥
साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी॥१॥

रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा॥
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं॥२॥

देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता॥
जे पद परसि तरी रिषनारी। दंडक कानन पावनकारी॥३॥

जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए॥
हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मैं देखिहउँ तेई॥४॥

जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ॥४२॥

ऐहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंदु एहिं पारा॥
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा॥१॥

ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए॥
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई॥२॥

कह प्रभु सखा बूझिए काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा॥
जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया॥३॥

भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा॥
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी॥४॥

सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना॥५॥

सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि॥४३॥

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥१॥

पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ॥
जौं पै दुष्ट हृदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई॥२॥

निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥
भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा॥३॥

जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते॥
जौं सभीत आवा सरनाईं। रखिहउँ ताहि प्रान की नाईं॥४॥

उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।
जय कृपाल कहि कपि चले अंगद हनू समेत॥४४॥

सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर॥
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता॥१॥

बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी॥
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन॥२॥

सघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा॥
नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता॥३॥

नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता॥
सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा॥४॥

श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥४५॥

अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा॥
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा॥१॥

अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भय हारी॥
कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा॥२॥

खल मंडली बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती॥
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती॥३॥

बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥
अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्हि जानि जन दाया॥४॥

तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।
जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥४६॥

तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना॥
जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा॥१॥

ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी॥
तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं॥२॥

अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे॥
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला॥३॥

मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ॥
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा॥४॥

अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।
देखेउँ नयन बिरंचि सिव सेब्य जुगल पद कंज॥४७॥

सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ॥
जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवै सभय सरन तकि मोही॥१॥

तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना॥
जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुहृद परिवारा॥२॥

सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥
समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं॥३॥

अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें॥
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें॥४॥

सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम॥४८॥

सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें॥।
राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा॥१॥

सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी॥
पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा॥२॥

सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी॥
उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही॥३॥

अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी॥
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा॥४॥

जदपि सखा तव इच्छा नहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं॥
अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा॥५॥

रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेउ राजु अखंड॥४९क॥

जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ॥४९ख॥

अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना॥
निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा॥१॥

पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी॥
बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक॥२॥

—-पीछे आगे—-


सुन्दर काण्ड
  1. मंगलाचरण
  2. श्री हनुमान्‌जी का लंका को प्रस्थान
  3. लंका वर्णन
  4. हनुमान्‌-विभीषण संवाद
  5. श्री हनुमान्‌जी अशोक वाटिका में
  6. श्री सीता-त्रिजटा संवाद
  7. श्री सीता-हनुमान्‌ संवाद
  8. श्री हनुमान्‌जी द्वारा अशोक वाटिका विध्वंस
  9. श्री हनुमान्‌-रावण संवाद
  10. लंकादहन
  11. श्री हनुमान्‌जी का सीताजी से विदा माँगना
  12. श्री राम-हनुमान्‌ संवाद
  13. श्री रामजी का समुद्र तट पर पहुँचना
  14. मंदोदरी-रावण संवाद
  15. रावण को विभीषण का समझाना
  16. विभीषण का श्री रामजी की शरण के जाना
  17. समुद्र पार करने के लिए विचार
  18. दूत का रावण को समझाना
  19. समुद्र पर श्री रामजी का क्रोध
  20. श्री राम गुणगान की महिमा

श्री रामचरितमानस

  1. बालकाण्ड
  2. अयोध्याकाण्ड
  3. अरण्यकाण्ड
  4. किष्किन्धाकाण्ड
  5. सुंदरकाण्ड
  6. उत्तरकाण्ड
  7. लंकाकाण्ड

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