प्रकृति का उल्लास है सावन

fast and festival of sawan

सावन का नाम सुनते ही मन वर्षा ऋतु के आनंद में डूब जाता है। त्योहारों की रौनक घर-गृहस्थी की नीरसता दूर कर देती है। परम पुरुष (शिव) और प्रकृति (भवानी) का प्रणय ही सावन की आध्यात्मिक आ‌र्द्रता है। शिव और शक्ति एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। इसलिए सावन सदा से ही शिव-शक्ति की अर्चना का पर्व काल रहा है।

सावन में शिव का पूजन

हिंदू पंचांग के बारह मासों में सावन भगवान भोलेनाथ को सर्वाधिक प्रिय है। इसीलिए यदि संभव हो तो शिव-भक्तों को सावन के सोमवार का व्रत अवश्य रखना चाहिए। प्रात:काल स्नान के बाद गाय के दूध, दही, घी, शहद अथवा स्वच्छ जल से शिवलिंग का अभिषेक करें, बेलपत्र चढ़ाएं और चंदन लगाएं। आक के फूल, धतूरा, धूप-दीप आदि अर्पित करके किसी शिव स्रोत का पाठ एवं ‘ॐ नम: शिवाय’ मंत्र का जप करें। दिनभर उपवास रखें, सूर्यास्त के बाद प्रदोषकाल में पुन:शिव जी की अर्चना करने के बाद सात्विक भोजन ग्रहण करें।

उज्जैन में सावन के प्रत्येक सोमवार को मृत्युलोक के अधिपति श्रीमहाकालेश्वर की सवारी निकलती है। वहां सावन की यह छटा उत्तर भारतीय पंचांगों में दिए गए श्रावण के कृष्णपक्ष से भाद्रपद के कृष्णपक्ष तक छाई रहती है। महीने के आखिरी सोमवार को श्रीमहाकाल की सवारी के दर्शनार्थ देश-विदेश से असंख्य श्रद्धालु उज्जैन पहुंचते हैं।

सर्प भगवान शंकर के आभूषण हैं। अत: नागपंचमी का पर्व भी इसी मास की शुक्लपक्ष पंचमी को मनाया जाता है। इस दिन रुद्रावतार श्रीहनुमान के ध्वजारोहण और कुश्ती-दंगल की भी परंपरा है, जो इसे आध्यात्मिक स्वास्थ्य दिवस बना देती है।

शक्ति की आराधना

जिस सावन मास में शिव जी का सर्वत्र पूजन हो, उसमें उनकी शक्ति शिवा की उपेक्षा कैसे की जा सकती है? सावन के प्रत्येक मंगलवार को मंगलागौरी की विशेष पूजा होती है। देवी पार्वती के इस अति विशिष्ट रूप का श्रीविग्रह वाराणसी के पंचगंगा घाट पर विद्यमान है। मंगलागौरी का दर्शन-पूजन करने के लिए सावन के प्रत्येक मंगलवार को यहां बहुत बड़ी संख्या में स्त्रियां आती हैं। पुराणों के अनुसार मंगलागौरी की परिक्रमा करने से संपूर्ण पृथ्वी की प्रदक्षिणा का पुण्यफल मिलता है। इनकी उपासना से अविवाहित कन्याओं के मंगली-दोष का भी शमन होता है।

काशी के दुर्गाकुंड पर विराजमान भगवती दुर्गा का विशेष मेला भी सावन में ही लगता है।

पूर्वी उत्तरप्रदेश के गांवों में श्रावण मास के कृष्णपक्ष की तृतीया को कजली तीज मनाने की परंपरा है। इसी लोकोत्सव से लोक गायन की एक प्रसिद्ध शैली का जन्म हुआ, जो कजरी के नाम से विख्यात हो गई। राजस्थान सहित उत्तर भारत के अधिकांश क्षेत्रों में सावन के शुक्ल पक्ष की तृतीया हरियाली तीज के नाम से विख्यात है। इस अवसर पर नवविवाहिताएं मायके जाती हैं। इस दिन मेहंदी रचाना और हरी चूडि़यां पहनकर झूला झूलना अति शुभ माना जाता है। इस दिन विवाहिताओं को मायके से विश्ेाष उपहार भेजा जाता है, जिसे ‘सिंधारा’ कहा जाता है। इस दिन विवाहिताएं जगदंबा से अखंड सुहाग का आशीष मांगती हैं। ऐसी मान्यता है कि विरह की अग्नि में तपकर गौरी शिव जी से इसी दिन मिली थीं।

वैष्णवों का झूलनोत्सव

सावन में ब्रज का झूलनोत्सव संपूर्ण विश्व में विख्यात है। श्रीवल्लभ संप्रदाय में ठाकुरजी पूरे श्रावण मास में झूला झूलते हैं। मथुरा के सुप्रसिद्ध द्वारकाधीश मंदिर में पूरे माह झूलन का उत्सव बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। श्रीनाथद्वारा स्थित श्रीनाथ जी के मंदिर में पूरे माह हिंडोला सजाया जाता है। जगन्नाथपुरी में श्रावण शुक्लपक्ष दशमी से पूर्णिमा तक ठाकुर मदनमोहनजी को मुक्ति मंडप मे सजाए गए झूले में झुलाया जाता है। श्रावण की पूर्णिमा को जगन्नाथ श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलभद्रजी का जन्मोत्सव मनाया जाता है। हरियाली तीज के दिन श्रीधाम वृंदावन में श्रीबांके बिहारी जी सोने के हिंडोले में विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देते हैं। गौड़ीय वैष्णवों के मंदिरों में झूलन का यह उत्सव श्रावण-शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक बड़े उत्साह से मनाया जाता है। सावन में भगवान शंकर और श्रीकृष्ण के उत्सवों का एक साथ होना इस बात का द्योतक है कि शिव सर्वोच्च वैष्णव हैं तथा श्रीकृष्ण सर्वोपरि शैव हैं। वस्तुत: ये दोनों एक-दूसरे के ध्येय, सखा और इष्ट हैं। अब आप भी सावन की इस आध्यात्मिक भाव वर्षा में भीगने को तैयार हो जाइए।

क्या शिवलिंग के पूजन का अधिकार स्त्रियों को नहीं है?

देश के कुछ हिस्सों में ऐसी भ्रामक धारणा है कि स्त्रियों को शिवलिंग का स्पर्श नहीं करना चाहिए। लेकिन शिव पुराण के अनुसार शिवलिंग की पूजा का अधिकार सभी को समान रूप से है। वस्तुत: शिवलिंग भगवान शिव के निराकार स्वरूप का प्रतीक है। शिवलिंग के जिस स्थान से जल निकलता है, परिक्रमा करते समय उसका उल्लंघन नहीं करना चाहिए। सामान्यतया शिवलिंग पर चढ़ाए गए प्रसाद को निर्माल्य कहा जाता है और उसे ग्रहण नहीं किया जाता। ऐसी मान्यता है कि शिव जी पर चढ़ाए गए प्रसाद पर उनके गणों का अधिकार होता है। लेकिन इस नियम के अपवाद स्वरूप द्वादश ज्योर्तिलिंगों और सिद्ध ऋषि-मुनियों द्वारा स्थापित शिव लिंगों पर चढ़ाया गया प्रसाद ग्रहण किया जा सकता है।

Courtsey: Jagran

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